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समर्थन का कठिन सिस्टम:70-80% किसान समर्थन मूल्य पर फसल बेचते ही नहीं; प्रदेश में 37.4% किसान ही समर्थन पर बेच रहे उपज

भिंड/शिवपुरी/मुरैना13 दिन पहले
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लघु और सीमांत किसान समर्थन मूल्य के लिए पंजीयन नहीं करा पाते क्योंकि पैदावार कम, बेचने में भी कठिनाई। प्रतीकात्मक फोटो - Dainik Bhaskar
लघु और सीमांत किसान समर्थन मूल्य के लिए पंजीयन नहीं करा पाते क्योंकि पैदावार कम, बेचने में भी कठिनाई। प्रतीकात्मक फोटो
  • समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी वाला कानून बनाने की मांग के बीच भास्कर की ग्वालियर-चंबल संभाग में हकीकत बताती ग्राउंड रिपोर्ट
  • संभाग में 20% किसान ही समर्थन पर बेच रहे उपज, इनमें भी आधे किसान वृहद

कृषि कानूनों को रद्द करवाने और समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी का कानून पास कराने को लेकर दिल्ली में तीन महीने से चल रहा किसान आंदोलन इन दिनों चर्चा में है। आठ मार्च को अब केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के संसदीय क्षेत्र श्योपुर में आंदोलन होगा। इधर, एमएसपी की गारंटी वाले काननू की मांग को लेकर भले इतना शोर हो रहा हो लेकिन प्रदेश में हालात जुदा हैं। ग्वालियर-चंबल संभाग के दतिया, भिंड, शिवपुरी, मुरैना और श्योपुर के 70 से 80 फीसदी किसान एमएसपी पर अपना गेहूं बेच ही नहीं पाते। ऐसा इसलिए क्योंकि समर्थन मूल्य पर उपज बेचने के लिए बनाए गए नियम काफी जटिल हैं।

पंजीयन से लेकर सत्यापन। इसके बाद उपज बेचने के लिए लंबी लाइन और भुगतान के लिए इंतजार। ऐसे में सीमांत व लघु किसान समर्थन मूल्य के बजाए मंडियों में ही बेचने को मजबूर होते हैं। यहां पर उन्हें भुगतान जल्दी मिल जाता है। खासबात यह है कि लघु और सीमांत किसानों की संख्या ही कुल किसानों के मुकाबले 70% है। अधिकतम 20 फीसदी किसान ही समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने के लिए पंजीयन कराते हैं। इनमें भी आधे से ज्यादा बड़े (वृहद किसान 50 बीघा से अधिक वाले) होते हैं।

एक बार पंजीयन करा लिया तो दोबारा क्यों कराए, केंद्र भी बढ़ें
श्योपुर के किसान स्वराज संगठन के जिलाध्यक्ष राधेश्याम मीणा ने बताया कि छोटे किसानों के पास उपज कम होती है। ऐसे में उनके लिए समर्थन मूल्य पर उपज बेचने के लिए सिस्टम सरल करना चाहिए। पंजीयन-सत्यापन से लेकर उपज बेचने के लिए खरीद केंद्रों पर लंबा इंतजार करना पड़ता है क्योंकि केंद्रों की संख्या कम रहती है। केंद्र बढ़ना चाहिए। ऐसे में ज्यादा इंतजार तो भाड़ा भी ज्यादा चुकाना होता है।

समर्थन मूल्य पर 19 सौ रुपए क्विंटल गेहूं बिका, लेकिन अब 1500 रु क्विंटल बिक रहा है। इसलिए समर्थन मूल्य जरूरी है। लेकिन किसान के सामने समस्या यह है कि पंजीयन का सिस्टम भी सरल होना चाहिए। जो किसान पहले पंजीयन करा चुके हैं, उनका दोबारा पंजीयन क्यों होना चाहिए। सिर्फ उनका सत्यापन होना चाहिए। खरीद केंद्र भी बढ़ना चाहिए। इससे किसानों की पहुंच वहां तक असान हो सके।

श्योपुर में वृहद किसान सबसे कम, भिंड में सीमांत सबसे ज्यादा

शिवपुरी में सबसे ज्यादा पंजीयन, पंजीयन के लिए बचे दो दिन

पंजाब-हरियाणा के मुकाबले आधा गेहूं समर्थन पर खरीदते हैं हम

ऐसी दिक्कतें भी...पहले खरीदा बाजरा, अब कहा- ले जाओ
मुरैना में दिसंबर में किसानों ने समर्थन मूल्य पर बाजरा बेचा। 199 किसानों का 9 हजार क्विंटल बाजरा पोर्टल पर दर्ज ही नहीं किया। अब इन किसानों से कहा गया है कि अपना बाजरा वापस ले जाओ। ऐसी दिक्कतों से भी किसान परेशान होते हैं।

झंझट से बचने छोटे किसान खरीद केंद्रों पर जाते ही नहीं
समर्थन मूल्य पर उपज बेचने के लिए किसान को पंजीयन कराने में मशक्कत करनी पड़ती है। केंद्र पर गेहूं बेचने के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है। गेहूं तुल जाने के बाद किसानों को भुगतान के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ता है। तुलाने व भुगतान के लिए लेनदेन करना पड़ता है। इन झंझटों से बचने सीमांत व छोटे किसान मंडी में उपज बेच देते हैं।

पंजीयन के लिए सिर्फ दो दिन, आगे बढ़ाने की मांग
प्रदेश सरकार ने समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने के लिए 20 फरवरी तक पंजीयन कराने के आदेश दिए थे लेकिन सहकारिता कर्मचरियों की हड़ताल की वजह से पांच दिन बढ़ाकर अंतिम तिथि 25 फरवरी कर दी। सरसों के पंजीयन की अंतिम तारीख पहले से ही 25 फरवरी ही थी। अब किसानों फिर से तारीख बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।

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