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जीवन का सार:बिना संस्कार का व्यक्ति शव की तरह संस्कारवान मरकर भी अमर: गणाचार्य

भिंडएक महीने पहले
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  • मुनि विराग सागर ने बताया जीवन का सार

व्यक्ति यदि अपनी गलती को सच्चे मन से स्वीकार कर लेता है तो उसके पास पाप भी धुल जाते हैं। यदि वह अपनी गलती ना माने तो उसकी सजा बढ़ जाती है। अतः हम अपने जीवन में हिंसा,झूठ, छल, कपट आदि पापों से बचने का प्रयास करें। यह वचन रविवार को चैत्यालय जैन मंदिर में जैन संत गणाचार्य विराग सागर ने कहे।

उन्होंने कहा कि मानव जीवन पाकर व्रत सहित जीवन व्यतीत करना चाहिए, क्योंकि मानव जीवन पुण्य से प्राप्त होता है। पुण्य रहते ही पुण्य को बढ़ाने में समझदारी है। महाराज ने धर्मसभा में आगे बोलते हुए बताया कि मात्र संस्कार ही पर्याप्त नहीं है, हमारे जीवन में सुसंस्कार होना चाहिए। माता-पिता बच्चों को जन्म दें,तो उसे सुसंस्कार भी दें।

संस्कार विहीन व्यक्ति जीते-जागते भी शव की तरह है और सुसंस्कारवान व्यक्ति मरकर भी अमर हो जाता है। सुसंस्कारों का उद्गम किसी स्कूल, पाठशाला या फैक्ट्री से नहीं, देव शास्त्र एवं गुरु के चरणों में होता है। प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें, ताकि भविष्य में वह बच्चे आपको सुख प्रदान करें।

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