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समृति शेष:मशहूर कथाकार, कवि, हिंदी नवगीत आंदोलन के जनक डॉ. ओमप्रभाकर अवस्थी नहीं रहे

भिंड13 दिन पहले
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डॉ.ओम प्रभाकर - Dainik Bhaskar
डॉ.ओम प्रभाकर
  • 65 वर्ष की उम्र में सीखी थी उर्दू भाषा, लिख दीं कई गजलें

हिंदी के मशहूर कथाकार, कवि, नवगीत आंदोलन के जनक डॉ. ओमप्रभाकर अवस्थी का मंगलवार की शाम करीब 5 बजे देवास जिले में निधन हो गया। वे पिछले कुछ वर्षों से बीमार चल रहे थे। डॉ. ओमप्रभाकर मूलतः भिंड शहर के निवासी थे। साथ ही शासकीय एमजेएस महाविद्यालय में हिंदी विभाग में प्राध्यापक भी रहे। उन्हें हिंदी की नई कविता, कहानी और उर्दू गजलों के लिए तमाम शीर्ष पुरस्कार मिले हैं।

शहर में किला के सामने आज भी उनका मकान है, जो किसी समय साहित्यकारों का अड्डा हुआ करता था। डॉ. अवस्थी का जन्म 5 अगस्त 1941 को हुआ था। उन्हें जानने वाले लोगों की मानें तो हिंदी भाषा में अच्छा खासा दखल रखने वाले डॉ. अवस्थी ने सेवानिवृत्त के पश्चात करीब 65 वर्ष की उम्र में न सिर्फ उर्दू तालीम ली, बल्कि उस पर इतनी अच्छी पकड़ भी बनाई कि कुछ ही सालों बाद उन्होंने अरबी में उर्दू की गजलें लिखना प्रारंभ कर दिया। पिछले कुछ वर्षों से वे उर्दू में नज्म और गजलें लिख रहे थे। उनकी वर्ष 2007 में उर्दू गजल संग्रह तिनके में आशियाना किताब घर इलाहबाद से प्रकाशित हुआ था, जो काफी चर्चित रहा।

17 वर्ष की उम्र में धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी पहली कविता
डॉ. ओमप्रभाकर अवस्थी को बचपन से ही लिखने पढ़ने का काफी शौक रहा। 17 वर्ष की आयु में वर्ष 1958 में उनकी पहली कविता धर्मयुग में प्रकाशित हुई। वहीं उनकी पहली कहानी भी इसी वर्ष युग चेतना लखनऊ में प्रकाशित हुई। वे पिछले करीब 45 वर्षों से लगातार देश की जानी मानी हिंदी पत्र पत्रिकाओं में पुस्तकों की समीक्षा करते रहे। उनकी लिखी रचनाएं यूपीएससी के सिविल सर्विस के हिंदी साहित्य विषय के पाठ्यक्रम में भी शामिल रही। उनके इकलौते बेटे ईशान अवस्थी भी जाने माने पत्रकार हैं।

हिंदी नवगीत के प्रथम सम्मेलन का किया संकलन
डॉ ओमप्रभाकर अवस्थी ने वर्ष 1964 में अलवर राजस्थान में हुए हिंदी नवगीत के प्रथम सम्मेलन संकलन कविता-64 का संपादन किया, जिसे आज भी हिंदी नवगीत धारा में ऐतिहासिक महत्व प्राप्त है। इन्हीं वर्षों में उन्होंने अलवर से ही हिंदी की प्रथम लघु काव्य पत्रिका शब्द का संपादन किया। डॉ अवस्थी को वर्ष 1973 में प्रथम काव्य संग्रह पुष्पचरित के लिए मध्यप्रदेश साहित्य परिषद भोपाल द्वारा माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार मिला। वर्ष 1977-78 में उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा पुरस्कार मिला। इसके अलावा मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी से पुरस्कार सहित उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए।

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