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शिक्षा का अधिकार:स्कूलों में प्रवेश के लिए सिर्फ दो दिन शेष, अब भी 62 प्रतिशत सीटें खाली

सेंवढ़ा19 दिन पहले
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  • निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को लेकर वंचित वर्ग की बेरुखी

अशासकीय स्कूलों में कमजोर वंचित समूह के बच्चों को कक्षा नर्सरी से 8वीं तक निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए ऑनलाइन लिंक ओपन हुए 27 दिन गुजर गए। पर अभी भी 807 के मुकाबले केवल 303 सीटों के लिए ही आवेदन किए गए। यानि 505 सीटों के लिए आवेदन ही नहीं किए गए। जिन 303 बच्चों ने ऑनलाइन आवेदन किए उनमें से केवल 157 ने ही सत्यापन करवाया।

इस प्रकार 62 फीसदी सीटों के लिए तो आवेदन ही नहीं हुआ। जिन 38 फीसदी सीटों के लिए फार्म भरे गए, उनमें 50 फीसदी ने सत्यापन करवाया चूंकि सत्यापन होने के बाद भी प्रवेश दिया जाता है और इस प्रकार वर्तमान में 20 फीसदी सीटें ही भरने की संभावना है। यह सब तब हो रहा है जब शासन द्वारा 10 जून से 30 जून की तय समय सीमा को बड़ा कर 9 जुलाई कर दिया। अब महज 2 दिन में बची 68 फीसदी सीटों के लिए आवेदन होना है।

दो वर्ष बाद खुली इस लिंक में इस बार आधार कार्ड की अनिवार्यता के चलते यह स्थिति निर्मित हुई है। बगैर आधार के फार्म ऑनलाइन नहीं हो रहे हैं, दूसरी ओर 3 से 5 वर्ष की उम्र के अधिकतर बच्चों के आधार कार्ड ही नहीं बने हैं। यहां बता दें कि गत वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते यह प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ नहीं हो सकी थी। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2010 के आते ही अब प्रत्येक अशासकीय स्कूल को अपनी छात्र संख्या के मान से प्रथम प्रवेशित कक्षा में न्यूनतम 25 फीसदी छात्रों को प्रवेश देना अनिवार्य होता है।

इस योजना के तहत प्रवेशित छात्र छात्राओं को स्कूल में फीस का भुगतान नहीं देना पड़ता है। शासन इन बच्चों की फीस प्रतिपूर्ति स्वयं करती है। हालांकि शासन द्वारा दी जाने वाली फीस एक निश्चित सीमा तक रहती है, जो कि बड़े स्कूलों की फीस के मुकाबले काफी कम रहती है। पर अधिनियम का पालन हर स्कूल के लिए करना अनिवार्य होता है। पिछले कई वर्ष से स्कूलों में प्रवेश लेने के लिए पात्र छात्र छात्रा को ऑन लाइन प्रक्रिया के तहत आवेदन करना पड़ता है। अभिभावक द्वारा लाॅक किए गए आवेदन में प्राथमिकता के आधार पर बच्चों को स्कूल का एलाटमेंट होता है। एक ही स्कूल की मांग दो बच्चों द्वारा किए जाने पर लॉटरी के माध्यम से चयन होता है। यहां बता दें कि पिछले कुछ वर्षों से शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत प्रवेश लेने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या में गिरावट आई है।

आधार कार्ड बना मुख्य वजह

इस बार ऑनलाइन फार्म भरते वक्त ही बच्चे के आधार कार्ड का नंबर डाला जा रहा है। चूंकि 5 वर्ष से कम उम्र के अधिकतर बच्चों के पास आधार कार्ड नहीं होता है और ऐसे में वह आवेदन से वंचित हो रहे हैं। पात्रता की शर्त पूरी करने के बावजूद आधार कार्ड की अनिवार्यता के कारण कई बच्चे प्रवेश प्रक्रिया से बाहर हो रहे हैं और अब ऐसे बच्चों को या तो शासकीय स्कूलों में प्रवेश लेना पड़ेगा या फिर पसंद के प्राईवेट स्कूलों में फीस देकर ही पढ़ाई करनी होगी। इस प्रकार अधिनियम का मूल उद्देश्य पूरा नही हो सकेगा। स्कूल संचालक एवं संगठन से जुड़े पदाधिकारियों ने शासन को पत्र लिखकर आधार की अनिवार्यता समाप्त करने का आव्हान किया है।

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