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संत गंगादास का इतिहास पढ़ना जरूरी है:महारानी लक्ष्मीबाई के दीक्षा गुरु संत गंगादास का इतिहास पठनीय: राणा

सेंवढ़ाएक महीने पहले
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महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस के अवसर पर लोगों को इतिहास से जुड़ी जानकारी का प्रचार प्रसार करना चाहिए, ताकि हमारे वैभवशाली अतीत से युवा वाकिफ हों। कवि भूपेंद्र राणा ने यह विचार बलिदान दिवस की पूर्व संध्या पर निवास पर आयोजित संक्षिप्त गोष्ठी में कही। गोष्ठी का आयोजन अखिल भारतीय साहित्य परिषद के तत्वाधान में हुआ। राणा ने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई के साथ संत गंगादास का इतिहास पढ़ना जरूरी है।

वह त्यागी संत एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका जन्म 14 फरवरी 1823 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले रसूलपुर बहलोलपुर गांव के जाट परिवार मे हुआ था। बचपन का नाम गंगाबक्ष था। महज 12 वर्ष की अवस्था मे अनाथ हो गए। वह धार्मिक प्रवृत्ति के थे व साफसफाई पर विशेष ध्यान देते थे।

इनकी बुद्धिमता देखकर बुलंदशहर की कुटी के संत विष्णु दास उदासीन ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया था। 1857 की क्रांति में अग्रदूत रहे संत गंगादास अपनी मातृभूमि से बहुत प्रेम करते थे व अंग्रेजों से मात्र भूमि को मुक्त कराना चाहते थे। इस समय वे ग्वालियर में गंगादास की शाला मे रह रहे थे। वह महारानी लक्ष्मीबाई के पिता के गुरू थे व लक्ष्मी बाई ने भी इनसे युद्धकौशल सीखा। वह झांसी की रानी के साथ स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए लोगों को जागृत करते थे। ग्वालियर में स्वर्णरेखा के पास बने समाधि स्थल के बगल से ही संत गंगादास का बगीचा है।

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