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कोरोना का असर:पहली बार जला सबसे ऊंचे कद का रावण, समिति का दावा- अयाेध्या में 55 फीट का जला, यहां 65 फीट का

दतियाएक महीने पहले
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  • नहीं हुआ कोई मंच का कार्यक्रम, गृहमंत्री ने भी लोगों के बीच पहुंचकर देखा दहन

कोरोनाकाल का पहला रावण दहन रविवार की रात किया गया। आचार संहिता के कारण कई तरह की बंदिशों के बीच कार्यक्रम की भव्यता में किसी तरह का फर्क नहीं पड़ा। रामलीला समिति ने 1970 से स्टेडियम पर रावण दहन की परंपरा शुरू की और तभी से हर साल स्टेडियम पर रावण दहन हो रहा है। पिछले 12 साल में ही रावण का कद 45 फीट बढ़ गया। यही नहीं 12 साल पहले तक स्टेडियम पर रावण अकेला जलता था लेकिन वर्ष 2009 से स्टेडियम पर रावण के साथ कुंभकरण और मेघनाद के भी पुतले फूंके जाने लगे।

रामलीला समिति के अध्यक्ष रमेेश गंधी का दावा है कि रविवार की रात दतिया में जलाए गए रावण का पुतला सबसे ऊंचा 65 फीट का था। इसके बाद 55 फीट का रावण अयाेध्या में जलाया गया है। मालूम हो कि दतिया में जब तक राजे-रजवाड़े रहे तब तक रावण दहन की परंपरा नहीं थी। राजा की सवारी निकलती थी और सुरैयन मैदान (स्टेडियम) पर पाड़ा का बध करने की परंपरा थी। देश की आजाद के बाद अंतिम शासक गोविंद सिंह और उनके जाने के बाद बलभद्र सिंह ने यह परंपरा जारी रखी। लेकिन 1970 से यह पाडा मारने की परंपरा और राजसी सवारी निकलने की परंपरा खत्म हो गई।

12 साल में 65 फीट बढ़ गई रावण के पुतले की ऊंचाई, दहन देखने लोगों की भीड़ भी बढ़ी
स्टेडियम पर 1970 से हर साल दशहरे पर रावण दहन हो रहा है। लेकिन साल 2008 से रावण की ऊंचाई लगातार बढ़ती गई। पहले पांच से 10 फीट तक ऊंचाई बढ़ी। तीन साल से स्टेडियम पर रावण 60 फीट ऊंचा बनाकर जलाया जाने लगा। इस साल रावण की ऊंचाई पांच फीट और बढ़ाकर 65 फीट कर दी गई। समिति पदाधिकारी के दावे के अनुसार इतनी ऊंचाई देश भर में किसी रावण की कहीं नहीं है। इस साल केवल अयोध्या में ही 55 फीट ऊंचा रावण जलाया गया। यही नहीं 12 साल पहले तक स्टेडियम पर अकेला रावण का पुतला ही जलता था, लेकिन पिछले 12 साल से उसका भाई और बेटा भी साथ में जल रहा है। रावण की ऊंचाई जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है, उसका दहन देखने स्टेडियम में आने वाले लोगों का आकर्षण भी बढ़ता गया।

गलियों में जलता था रावण, बच्चे कंधे पर धनुष टांगकर घूमते थे
साहित्यकार विनोद मिश्रा बताते हैं कि दतिया में दशहरे की अपनी अलग परंपरा है। दो दशक पहले तक हर गली मोहल्ले में छोटे-छोटे बच्चे भी रावण बनाकर दशहरे पर जलाते थे। बच्चे कंधे पर धनुष बाण टांगकर राम बनते थे और रावण को जलाते थे। बच्चों के अंदर भी रावण जलाने को लेकर अलग भावना रहती थी। बच्चे राक्षस का वध करते थे जबकि बच्चियां नवरात्र में दरवाजे पर सुअटा खेलती थीं और सुअटा राक्षस रावण का दहन कर वध करती थीं। लेकिन बदलते परिवेश में ज्ञानवर्धक परंपराएं बंद हो गईं। अब शहर में गलियों में रावण जलना बहुत कम हो गया है।

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