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उपलब्धि:मुजफ्फरनगर की कुश्ती खिलाड़ी दिव्या ने गोहद में छह साल रहकर सीखे दांव-पेंच, अब राष्ट्रपति ने अर्जुन अवार्ड देकर किया सम्मानित

गोहदएक वर्ष पहले
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  • महिला कुश्ती खिलाड़ी दिव्या काकरान ने वर्ष 2010 से 2016 तक गोहद में रहकर सीखे कुश्ती के दांव पेंच

खेल जगत के सबसे सर्वोच्च खिलाड़ी सम्मान अर्जुन अवार्ड से सम्मानित हुईं महिला कुश्ती खिलाड़ी दिव्या काकरान ने जहां अपने गृह जिले मुजफ्फर नगर के साथ भिंड क्षेत्र की गोहद तहसील का नाम भी दुनिया भर में रोशन किया है। दिव्या की इस उपलब्धि से गोहद नगरवासियों में हर्ष है।

बता दें कि अर्जुन अवार्ड विजेता दिव्या काकरान ने छह साल गोहद में रहते हुए कुश्ती के दांव-पेंच सीखे थे। गौरतलब है कि कुश्ती खिलाड़ी दिव्या काकरान वर्ष 2010 से 2016 तक गोहद नगर के वार्ड क्रमांक 15 में कोच वासुदेव शुक्ला के यहां रहते हुए दंगल में कुश्ती लड़ना सीखी थी। साथ ही इन छह साल में दिव्या ने स्थानीय स्तर पर होने वाले दंगलों में भाग लेते हुए कई महिला पहलवानों को हराया था।

स्थानीय स्तर पर दंगल प्रतियोगिता जीतने के दौरान खेल मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया,पूर्व मंत्री लाल सिंह आर्य सम्मानित कर चुके हैं। पिता कोच वासुदेव शुक्ला के पास छोड़कर गए थेःगोहद निवासी कोच वासुदेव शुक्ला कई वर्ष से बच्चों को कुश्ती सिखाते आ रहे हैं। वासुदेव शुक्ला खिलाड़ी दिव्या के पिता सूरज काकरान पुराने मित्र हैं।

इस दोस्ती के चलते सूरज काकरान वर्ष 2010 में अपनी बेटी दिव्या को कुश्ती के दांव-पेंच सिखाने के लिए कोच वासुदेव शुक्ला के पास छोड़ गए थे।

रोज तीन घंटे अखाड़े में करती थीं मेहनत
कोच वासुदेव शुक्ला ने बताया कि दिव्या को बचपन से ही कुश्ती से लगाव था,जिसके चलते वह कम समय में अपनी उम्र के महिला पहलवानों में एक अच्छी खिलाड़ी बनकर उभरी थी। स्थानीय स्तर पर होने वाली दंगल प्रतियोगिता में दिव्या द्वारा कई हम उम्र के पहलवानों को हराया गया था।

छह साल गोहद में रहते हुए प्रशिक्षण के दौरान दिव्या रोजाना तीन घंटे अखाड़े में बिताती थी और रोज 5 किलोमीटर दौड़ उस समय उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी। सम्मान देने कन्या स्कूल में दिव्या के नाम से कक्ष बना खिलाड़ी दिव्या काकरान द्वारा कुश्ती के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि को लेकर गोहद नगर के शासकीय कन्या विद्यालय में पूर्व प्राचार्य केएल शेजवार द्वारा दिव्या काकरान कक्ष बनाया गया है।

वहीं कक्ष के बाद स्कूल प्रबंधन द्वारा स्कूल की छात्राओं को प्रोत्साहित करने के लिए दिव्या की तस्वीर लगाई गई है। खिलाड़ी दिव्या अभी तक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए 14 मेडल जीत चुकी हैं। हार न मानने की जिद कर वजह से मिला मुकाम दिव्या ने बताया कि पिताजी के जुनून ने मुझे पहलवान बना दिया। जब हार न मानने का किसी के अंदर जज्बा हो तो भगवान भी उसकी मदद करते हैं। मुझे अभी तक अपने खेल करियर में सबसे ज्यादा खुशी तब हुई जब ओलिंपिक क्वालीफाई दौर में वर्ष 2019 में एशियन चैंपियनशिप में चीन में ब्रॉन्ज मेडल जीता था।

वर्ष 2015 में एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में देश के लिए स्वर्ण पदक जीता इस पल को मैं कभी भूला नहीं सकती हूं।

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