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उपचुनाव:पांच विधानसभा में 45% वोटर महिलाएं, उपचुनाव में किसी भी पार्टी ने महिला को नहीं दिया टिकट; 63 साल में मुख्य दलों ने सिर्फ 4 बार महिलाओं को दिया मौका

मुरैना5 दिन पहले
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प्रतीकात्मक फोटो
  • 1957 से 2018 तक 14 चुनावों में 20 महिलाओं ने आजमाई किस्मत, भाजपा-कांग्रेस ने 2-2 बार ही दिया टिकट
  • नेहा किन्नर ही भाजपा-कांग्रेस, बसपा को दे सकीं टक्कर

राजनीति में महिलाएं शुरू से ही हांसिए पर रही हैं। लेकिन राष्ट्रीय दलों ने जब-जब महिलाओं पर यकीन किया, महिलाओं ने अपनी काबिलियत साबित करके दिखाई। मुरैना जिले की बात करें तो 1957 में मप्र के गठन से लेकर 2018 तक 63 साल में 20 बार विस चुनाव हुए, जिनमें राष्ट्रीय दल भाजपा-कांग्रेस ने सिर्फ दो-दो बार ही महिला प्रत्याशियों को मौके दिए। 1957 के पहले ही चुनाव में मुरैना सीट से सागर चमेलीबाई कांग्रेस के टिकट से विधायक चुनी गईं।

वहीं 2003 में दिमनी विधानसभा सीट से भाजपा ने संध्या राय को मौका दिया तो उन्होंने भी जीत हासिल की। हालांकि वर्ष 1990 के बाद महिलाओं ने दमदारी से राजनीति में अपनी भागीदारी बढ़ाई तो राजनैतिक दलों ने उन्हें कम ही मौके दिए। कई महिलाओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में ताल ठोकी तो जनता ने उन्हें नकार दिया। वर्ष 2018 के उपचुनाव में भी जिले की सभी छह सीटों पर भाजपा, कांग्रेस व बसपा ने किसी भी महिला प्रत्याशी को मौका नहीं दिया। ठीक ऐसे ही हालात इस उपचुनाव में भी हैं।

6 चुनावों में किसी भी दल ने महिलाओं को नहीं दिया मौका
शुरुआती 2 चुनावों में कांग्रेस द्वारा जिले में चमेलीबाई को 2 बार टिकट दिया गया। इसमें से एक में उनकी जीत हुई और दूसरा चुनाव वे हार गईं। इसके बाद 1972 से 1990 तक 6 चुनावों में भाजपा, कांग्रेस तो छोड़िए किसी भी अन्य दल ने महिलाओं को चुनाव लड़ने का मौका ही नहीं दिया। इसके बाद 1993 के चुनाव में जौरा सीट से सुशीला गोस्वामी, नूरजहां, हबीबन, कमलादेवी, मुरैना विस से शांतिदेवी, 2003 में जौरा विस से पार्वती जाटव, मुरैना से सुमन इंदौरिया को किसी भी राष्ट्रीय दल ने टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय ही चुनाव लड़ी लेकिन इन्हें जनता ने नकार दिया। हालांकि वर्ष 2018 के चुनाव में सबलगढ़ विस से भाजपा ने पूर्व विधायक मेहरवान सिंह रावत की बहू सरला रावत को टिकट दिया लेकिन वे जीत हासिल नहीं कर सकीं।

नेहा किन्नर ही भाजपा-कांग्रेस, बसपा को दे सकीं टक्कर
2003 में संध्या राय के विधायक बनने के बाद फिर महिलाओं के टिकट पर राष्ट्रीय पार्टियों ने ब्रेक लगा दिए। वर्ष 2008 में सबलगढ़ से ममता मौर्य, मुरैना से मनोरमा जैन, अनीता चौधरी, अंबाह से गुड़िया कारखुर, 2013 में सबलगढ़ से रेखा यादव, मुरैना से सुमन शाक्य व दिमनी से मंजू अग्रवाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ा लेकिन जनता ने उन्हें तबज्जो नहीं दी। वर्ष 2018 में भाजपा ने जहां सबलगढ़ से सरला रावत को टिकट दिया तो अंबाह सीट से निर्दलीय नेहा किन्नर मैदान में कूंद पड़ी। आजादी से 2018 तक नेहा किन्नर एकमात्र निर्दलीय महिला प्रत्याशी रहीं जिन्होंने 29 हजार 796 वोट लाकर भाजपा, कांग्रेस, बसपा के दांत खट्‌टे कर दिए। हालांकि इस सीट पर अंतत: जीत कांग्रेस के कमलेश जाटव की हुई।

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