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महा-उपचुनाव:दिमनी, मुरैना-अंबाह में बसपा ने ही तोड़ा भाजपा का तिलिस्म, जौरा में भाजपा सिर्फ खाता

मुरैना8 महीने पहले
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प्रतीकात्मक फोटो - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक फोटो
  • साल 2008 या इसके बाद जिले की इन तीनों विधानसभा सीटों पर दिखी बसपा की ताकत

मुरैना जिले की दिमनी, अंबाह व मुरैना विधानसभा लंबे समय से भाजपा का गढ़ रही है। लेकिन भाजपा के तिलिस्म को इन तीनों विधानसभा में सिर्फ बसपा ही तोड़ सकी। वहीं जौरा विधानसभा में भाजपा सिर्फ एक बार (2013) ही जीत हासिल कर सकी। जिले की 3 विधानसभा अंबाह, दिमनी व मुरैना को भाजपा की दबदबा वाली विस सीट माना जाता रहा है। अंबाह में 1993 में भाजपा के वंशीलाल यहां से पहली बार चुनाव जीते। इसके बाद उन्होंने 1998 व 2003 में लगातार दूसरी व तीसरी दर्ज की।

जब उनकी जगह टिकट काटकर भाजपा ने कमलेश सुमन को प्रत्याशी बनाया तो वह भी जीते। इस सीट पर भाजपा की लगातार हार का सिलसिला 2013 में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी सत्यप्रकाश ने तोड़ा, जो इस उपचुनाव में कांग्रेस से प्रत्याशी हैं। इसी प्रकार मुरैना विधानसभा में 1998 में सेवाराम गुप्ता, 2003 में रुस्तम सिंह जीते। इससे पहले इसी सीट पर 2 बार कांग्रेस, 2 बार भाजपा, एक बार जनता पार्टी व 2 बार जनसंघ के प्रत्याशी जीत चुके हैं। ऐसे में वर्ष 2008 में बसपा से चुनाव लड़े परशुराम मुदगल ने पहली बार जीत हासिल करते हुए भाजपा को शिकस्त दी। दिमनी विधानसभा के वोटर भी भाजपा समर्थित हैं।

यही वजह रही कि 1972 से लेकर 1990 तक यहां पहले जनसंघ फिर जनता पार्टी और इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी लगातार जीतते रहे। 1993 में यहां कांग्रेस के रमेश कोरी ने जीत हासिल की। लेकिन इसके बाद फिर लगातार 2 चुनावों 1998 में मुंशीलाल, 2003 में संध्या व 2008 में शिवमंगल सिंह भाजपा से जीते। भाजपा के लिए अभेद्य किला रही इस सीट पर 2013 में बसपा के बलवीर डंडौतिया ने जीत हासिल कर भाजपा की लगातार जीत का सिलसिला खत्म किया और वर्ष 2018 में कांग्रेस के गिर्राज डंडौतिया ने इसी सीट पर जीत हासिल की।

जौरा सीट भाजपा के लिए सपना, सिर्फ एक बार जीती
जौरा विधानसभा सीट जीतना हमेशा से भाजपा के लिए सपना रही। 1977 में जरूर इस सीट पर इमरजेंसी के विरोध की लहर में जनता पार्टी के सूबेदार सिंह ने यहां से जीत दर्ज की। इसके बाद यहां कांग्रेस व बसपा का ही दबदबा रहा। भाजपा की जीत की भूख 2013 के चुनावों में शांत हुई जब सूबेदार सिंह रजौधा ने यहां से पहली बार भाजपा को जीत दिलाई। लेकिन अगले ही चुनाव में वे हार गए। एक बार फिर भाजपा ने इस सीट पर सूबेदार पर ही दांव लगाया है।

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