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ईद:कोरोना के चलते घरों में अदा की नमाज, गले भी नहीं मिले, दूर से कहा- ईद मुबारक

मुरैना14 दिन पहले
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बकरीद पर बंद रही शहर की जामा मस्जिद।
  • शहर की सभी 16 मस्जिदों में 5-5 लोगों ने अदा की बकरीद की नमाज
  • बाजार में भीड़ न बढ़े इसलिए पुलिस के अधिकारी करते रहे शहर का भ्रमण

कोरोना संक्रमण के चलते इस बार ईद-उल-अजहा (बकरीद) का त्यौहार फीका रहा। शनिवार को शहर की जामा मस्जिद सहित 16 अन्य मस्जिदों में पांच-पांच लोगों ने ईद की नमाज अदा की। काजीबसई गांव की दो मस्जिदों पर भी सामूहिक रूप से ईद की नमाज नहीं पढ़ी गई। मुस्लिम समाज ने अपने-अपने घरों में ईद की नमाज अदा की तथा पैगंबर हजरत साहब से भारत को काेराेना संक्रमण से मुक्ति दिलाने की दुआ मांगी। इस बार नमाज अदा करने के बाद पहली बार मुस्लिम समाज लोग एक-दूसरे के गले नहीं मिले, बल्कि एक मीटर की दूरी बनाकर ईद की मुबारकबाद दी।

यहां बता दें कि जिले में बढ़ रहे कोरोना संक्रमण को ध्यान में रखते हुए शहकाजी मोहम्मद अशरफ, जामा मस्जिद के पेशइमाम मोहम्मद रफीक एवं काजी बसई गांव के रिटायर्ड फौजी हाजी मोहम्मद रफीक ने मुस्लिम समाज के लोगों से अपील की थी कि कोरोना वायरस के चलते मस्जिदों में सामूहिक रूप से नमाज अदा करने पर पाबंदी है। इसलिए मुस्लिम समाज के सभी लोग बकरा ईद की नमाज अपने-अपने घरों पर अदा करें और लॉकडाउन का पालन करते हुए हषोर्ल्लास से त्यौहार मनाएं।

ईद और बकरीद में क्या है अंतर है: इस्लामी साल में दो ईद मनाई जाती हैं जिनमें से एक ईद-उल-जुहा और दूसरी ईद-उल-फितर। ईद-उल-फितर को मीठी ईद भी कहा जाता है। इसे रमजान को खत्म करते हुए मनाया जाता है। लेकिन बकरीद का महत्व अलग है। हज की समाप्ति पर इसे मनाया जाता है। यहां बता दें कि मीठी ईद के बाद बकरा ईद इस्लाम धर्म का प्रमुख त्योहार है।

गरीबों को घरों जाकर दी दावत व सहायता सामग्री

ईद के त्यौहार पर गरीब लोगों का विशेष ख्याल रखा जाता है। इस त्यौहार पर उन्हें भोजन, पैसा व जरूरत का सामान देने की परंपरा है। इस कारण हर साल ईद के त्यौहार पर मस्जिदों के आसपास गरीब लोगों की लाइन लगी रहती थी। लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण के चलते मस्जिदें बंद रहीं। ऐसे में मुस्लिम समाज के लोगों ने घर रहकर ही नमाज अदा की। लेकिन गरीब लोगों का ख्याल हुए मुस्लिम समाज के लोगों ने घर पहुंचकर न केवल उन्हें दावत दी, बल्कि उनकी आर्थिक रूप से मदद कर उन्हें जरूरत का समान भी उपलब्ध कराया।

फर्ज-ए-कुर्बानी का दिन है बकरीद का त्योहार

ईद के त्यौहार पर मुस्लिम समाज के लोगों ने सुबह 7 बजे से 7.16 मिनिट तक घरों में नमाज अदा की। इसके बाद कुर्बानी प्रथा भी सामूहिक न करते हुए घरों पर ही की गई। इस मौके पर हाजी मोहम्मद रफीक ने बताया कि इस्लाम मजहब की मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि पैगंबर हजरत इब्राहिम से ही कुर्बानी देने की प्रथा शुरू हुई थी। उन्होंने बताया कि अल्लाह ने एक बार पैगंबर इब्राहिम से कहा था कि वह अपने प्यार और विश्वास को साबित करने के लिए सबसे प्यारी चीज का त्याग करें। इसलिए पैगंबर इब्राहिम ने अपने इकलौते बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया था।

कहते हैं कि जब पैगंबर इब्राहिम अपने बेटे को मारने वाले थे। उसी वक्त अल्लाह ने अपने दूत को भेजकर बेटे को एक बकरे से बदल दिया था। तभी से बकरा ईद अल्लाह में पैगंबर इब्राहिम के विश्वास को याद करने के लिए मनाई जाती है। इस त्योहार पर नर बकरे की कुर्बानी देने की परंपरा है। जिसे तीन भागों में बांटा जाता है, पहला भाग रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों को दिया जाता है। दूसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों और तीसरा परिवार के लिए होता है।

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