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कोरोना का असर:शहर में पहली बार नहीं निकला चल समारोह, सिद्ध योग में मनी गोपाष्टमी

मुरैना8 दिन पहले
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गाय का पूजन करते गाेविंद गाैशाला समिति के पदाधािकारी।
  • श्री गोविंद गौशाला समिति ने टॉउन हॉल परिसर में किया गौ-पूजा का अयोजन

कार्तिक शुक्ल अष्टमी को शहर में गोपाष्टमी का पर्व मनाया गया। लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण के चलते हर साल शहर में निकला जाने वाला चल समारोह नहीं निकाला गया। गोपूजन का आयोजन श्री गोविंद गौशाला समिति द्वारा टॉउन हॉल परिसर में किया गया। जहां शहर के लोगों ने सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक गायों की पूजा-अर्चना की।

इस अवसर पर गोविंद गौशाला समिति के अध्यक्ष तुलसीदास सिंघल ने कहा कि कार्तिक शुक्ल अष्टमी गोपाष्टमी के रूप में मनाई जाती है।

यह गायों की पूजा का पर्व है। गायें भारतीय संस्कृति की जीवन प्राण हैं और संसार का सबसे पवित्र पशु है। जिन्हें देवतुल्य माना जाता है। गाय के शरीर में सभी देवताओं का निवास माना जाता है। गाय के गोबर और गौमूत्र से लिपी भूमि, देव पूजा व यज्ञ के लिए सर्वोत्तम मानी गयी है। भगवान श्रीकृष्ण का गोविंद नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि उन्होंने गोपालन-गोसंरक्षण-संवर्दन व गौ सेवा के प्रति सभी लोगों को प्रेरित किया। गौ पूजन करने वालों में सुरेश जिंदल, संजय माहेश्वरी, योगेशपाल गुप्ता, गिर्राज अग्रवाल, मनोज जैन, मनोज सिंघल, सुनील राठी, गोपाल गुप्ता आदि प्रमुख रूप से शामिल थे।

वहीं गो-पूजन समारोह में गौशाला समिति के संरक्षक मोहनलाल गर्ग ने बताया कि गोपाष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के समय से ही मनाई जाती है। इंद्र के प्रकोप से गोप-गोपियों और गायों को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से अष्टमी तक गोवर्धन पर्वत को धारण किये रहे। अंत मे इंद्र ने अपने अहंकार को त्यागकर भगवान श्रीकृष्ण से छमा याचना की और कामधेनु नाम की गाय ने भगवान श्रीकृष्ण का अपने दूध से अभिषेक किया। श्रीकृष्ण ने भी उस दिन कामधेनु गाय की स्तुति की और गायों की रक्षा एवं पालन करने की प्रतिज्ञा की। सभी ग्राम वासियों ने भगवान श्रीकृष्ण की और सभी गायों की पूजा की इस उपलक्ष्य में ब्रज में उत्सव मनाया गया जो बाद में गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन गाय, गोवत्स(बछड़ों) तथा गोपालों के पूजने का विधान है।

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