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महामारी में महायोद्धा बने डाॅक्टराें की कहानी:कोरोना संक्रमिताें के इलाज के लिए दिन-रात ड्यूटी की, किसी ने बहन से राखी तक नहीं बंधवाई तो किसी ने चाची की मौत के बाद भी किया काम

ग्वालियर19 दिन पहले
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डाॅ. अनिल सिंह और -डाॅ. हरेंद्र सिंह। - Dainik Bhaskar
डाॅ. अनिल सिंह और -डाॅ. हरेंद्र सिंह।
  • जिन्होंने कोरोना की पहली और दूसरी लहर में एक भी अवकाश नहीं लिया

कोरोना वायरस संक्रमण से लड़ाई में हमारे डाॅक्टर दोहरी भूमिका निभा रहे हैं। तेजी से फैलने वाले इस वायरस के कारण संक्रमितों को कई-कई दिन अकेले अस्पताल में भर्ती रहना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में हमारे डाॅक्टर न केवल संक्रमितों का इलाज कर रहे हैं, बल्कि परिवार के सदस्य की भूमिका का निर्वहन करते हुए उनकी हिम्मत भी बढ़ा रहे हैं।

हालांकि, इस कठिन दौर में ये डॉक्टर मरीज के जितने पास रह रहे हैं, उतने ही परिवार से दूरी बनाए हुए हैं। किसी डाॅक्टर ने लंबे समय से बेटी को गोद में नहीं लिया है, तो किसी ने घर के एक कमरे तक खुद को सीमित कर लिया है। काेई बहन से राखी नहीं बंधा पाया तो किसी ने चाची की मौत के बाद भी काम किया। दैनिक भास्कर ने पिछले सोमवार को जेएएच के 4 डाॅक्टराें के समर्पण की कहानी प्रकाशित थी, आज पढ़िए ऐसे 3 और महायोद्धाओं के जज्बे की कहानी

मरीजों के इलाज और देखरेख में इतने व्यस्त रहे कि परिवार से भी दूरी बनाई, डॉक्टरों की कहानी उन्हीं की जुबानी

ड्यूटी की खातिर न दीपावली मनाई और न रक्षाबंधन पर बहन के घर गया
कोरोना संक्रमितों के इलाज के साथ हमने उनके परिजन की भूमिका निभाई और उनके आत्मविश्वास को गिरने नहीं दिया। ड्यूटी की खातिर दीपावली और रक्षाबंधन भी नहीं मना सके। मेरी बहन ग्वालियर में ही रहती हैं, लेकिन ड्यूटी पर होने के कारण मैं उनसे राखी बंधवाने नहीं जा सका। अच्छी बात यह है कि परिवार के लोग समझते हैं कि इस समय मेरा ज्यादा समय अस्पताल में रहना जरूरी है।
- डाॅ. अनिल सिंह, प्रभारी कोविड वार्ड, जिला अस्पताल

3 साल की बेटी काे गाेद में नहीं लिया रात-रातभर जागकर किए टेस्ट
कोरोना की शुरुआत में चुनौती ट्रूनेट टेस्ट करना रहा। कई ऐसे मरीजों के सैंपलों की जांच देर रात 3 से 4 बजे तक करनी पड़ती थी, जिनका अगले दिन ऑपरेशन होता था। देर रात लैब में काम करने के बाद सुबह साढ़े 9 बजे फिर अस्पताल में पहुंचकर लैब में काम करना, मानसिक और शारीरिक रूप से थकाने वाला था। संदिग्ध मरीजों के बीच रहने के कारण 3 साल की बेटी को भी गोद में लेना भी बंद करना पड़ा।
- डाॅ. हरेंद्र सिंह, पैथोलाॅजिस्ट, जिला अस्पताल, मुरार

चाची की माैत के बाद भी की ड्यूटी भतीजे की शादी में भी नहीं गया

मैं सिविल अस्पताल हजीरा का प्रभारी हूं और पत्नी माइक्रोबायोलाॅजी विभाग में डिमोंस्ट्रेटर हैं। दिनभर अस्पताल में ड्यूटी देने के कारण हमें घर में काफी सावधानी बरतनी पड़ी। बुजुर्ग माता-पिता को संक्रमण से बचाने के लिए हमने खुद को अलग फ्लोर पर शिफ्ट कर लिया। मार्च में भतीजे की उज्जैन में शादी थी लेकिन वहां नहीं जा सका। मेरी चाची की मृत्यु हाेने के बाद भी अवकाश नहीं लिया।
-डाॅ. प्रशांत नायक, प्रभारी, सिविल अस्पताल हजीरा

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