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ग्वालियर में भी होगी जीनोम सीक्वेंसिंग:DRDE का दावा- 2 से 3 दिन में जांच कर ओमिक्रॉन का पता लगाएंगे, GRMC जल्द भेजेगा सैंपल

ग्वालियर6 महीने पहलेलेखक: रामेंद्र परिहार

ग्वालियर में भी कोरोना के सैंपल की जीनोम सीक्वेंसिंग हो सकेगी। इससे जल्दी ही नए वैरिएंट ओमिक्रॉन का पता चल सकेगा। यहां डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टाब्लिशमेंट (DRDE) में जिनोम सीक्वेंसिंग हो सकेगी। डीआरडीई का दावा है कि इससे दो से तीन दिनों में रिपोर्ट मिल जाएगी। DRDE के डायरेक्टर ने GRMC (गजराराजा मेडिकल कॉलेज) के डीन को पत्र लिखकर सैंपल भेजने के लिए कहा है। डीन ने भी इस मामले में भोपाल स्वास्थ्य विभाग से इजाजत मांगी है। भोपाल से सहमति मिलते ही ओमिक्रॉन संदिग्ध केसों के सैंपल जfनोम सीक्वेंसिंग के लिए यहां भेजे जाएंगे। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग को दिल्ली की नेशनल लैब के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा। यहां भेजे गए सैंपल की रिपोर्ट डेढ़ महीने बाद भी नहीं मिली है।

DRDE का दावा- 2 से 3 दिन में दे देंगे रिपोर्ट
दो दिन पहले DRDE के चंडीगढ़ से लौटे वैज्ञानिक की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आने के बाद DRDE की लैब में उनके सैंपल का जीनोम सीक्वेंसिंग किया गया था। इसमें मंगलवार रात ओमिक्रॉन की पुष्टि हुई थी। इसके बाद ही DRDE डायरेक्टर ने गजराराजा मेडिकल कॉलेज ग्वालियर के डीन को पत्र लिखकर जिनोम सीक्वेंसिंग जांच के लिए सैंपल भेजने के लिए कहा है। प्रभारी डीन डीके शाक्य ने बताया है कि उन्होंने सैंपल जांच के लिए DRDE भेजने के लिए भोपाल स्वास्थ्य विभाग से इजाजत मांगी है। एक या दो दिन में इजाजत मिलने के बाद सैंपल भेजे जाएंगे।

विदेश से आने वाले या संदिग्ध मरीजों के सैंपल भेजे जाएंगे
जिनोम सीक्वेंसिंग के लिए हर किसी का सैंपल नहीं भेजा जाता है। ऐसे कोविड पॉजिटिव, जो हाई रिस्क देशों से लौटे हैं। यहां आने के बाद उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। उनके ही सैंपल भेजे जाएंगे। अभी तक ग्वालियर का स्वास्थ्य विभाग दिल्ली की नेशनल लैब के भरोसे थी। करीब डेढ़ महीने में 10 सैंपल जिनोम सीक्वेंसिंग के लिए भेजे गए हैं। इनकी रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है।

दो महीने में विदेश से आए 809 लोग
बीते दो महीने में विदेशों से 809 लोग ग्वालियर आए हैं। इनमें से 748 यात्री हाई रिस्क देशों से थे। 61 यात्री कम रिस्क वाले देशों से थे। इनमें से 750 ट्रेस हाे गए थे, लेकिन 58 ट्रेस ही नहीं हुए। हाई रिस्क देशों से आए 446 यात्रियों की सैंपलिंग हो चुकी है, लेकिन पता नहीं मिलने के कारण 302 की सैंपलिंग नहीं हो सकी है।

क्या होता है जीनोम सीक्वेसिंग?
कोशिकाओं के भीतर आनुवांशिक पदार्थ होता है। इसे DNA (डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड ), RNA (राइबो न्यूक्लिक एसिड) कहते हैं। इन सभी पदार्थों को सामूहिक रुप से जिनोम कहा जाता है। एक जीन की तय जगह और दो जीन के बीच की दूरी और उसके आंतरिक हिस्सों के व्यवहार और उसकी दूरी को समझने के लिए कई तरीकों से जिनोम मैपिंग या जिनोम सीक्वेंसिंग की जाती है।

इससे पता चलता है कि जिनोम में किस तरह के बदलाव आए हैं। यानी ओमिक्रॉन की जिनोम मैपिंग होती है, तो उसके जेनेटिक मटेरियल की स्टडी करके यह पता किया जाता है कि इसके अंदर किस तरह के बदलाव हुए हैं। यह पुराने कोरोना वायरस से कितना अलग है। जिनोम में एक पीढ़ी से जुड़े गुणों और खासियतों को अगली पीढ़ी में भेजने की काबिलियत होती है। इसलिए अलग-अलग वैरिएंट मिलकर नया कोरोना वैरिएंट बनाते हैं। इनके अंदर पुरानी पीढ़ी के जीनोम व नए वैरिएंट की खासियत होती है। जिनोम के अध्ययन को ही जिनोमिक्स कहा जाता है।

...और भी होंगे ओमिक्रॉन के पेशेंट
एक्सपर्ट का मानना है कि यह सिर्फ एक ही मरीज नहीं है। ग्वालियर में बाहर से आने वाले कई लोगों को ओमिक्रॉन वैरिएंट होगा, लेकिन रिपोर्ट समय पर नहीं मिलने या अभी तक नहीं मिलने के कारण यह सामने नहीं आ सके हैं। DRDE में जिनोम सीक्वेंसिंग किए जाने के बाद कई और मामले सामने आएंगे।

जल्द भेजे जाएंगे सैंपल
DRDE में जिनोम सीक्वेंसिंग की जांच अच्छी बात है। हम भोपाल बात कर रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई परेशानी होगी। जल्द सैंपल वहां भेजे जा सकते हैं, जिससे ओमिक्रॉन को ट्रेस करने में आसानी होगी।
डॉ. डीके शाक्य, प्रभारी डीन, गजराराजा मेडिकल कॉलेज, ग्वालियर

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