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तुलना:लाॅकडाउन में कम चले वाहन, फैक्ट्रियां रहीं बंद, फिर भी प्रदूषण बढ़ा

ग्वालियरएक महीने पहले
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  • अप्रैल से अगस्त तक वायु प्रदूषण का स्तर मानक से कम, लेकिन जनवरी से मार्च व सितंबर से दिसंबर तक बिगड़े हालात

लॉकडाउन के चलते ग्वालियर में लगभग चार माह तक सड़कों पर सीमित संख्या में वाहन दौड़े। ना धुआं उगलते सवारी वाहन चले और ना ट्रक व लोडिंग वाहन चले। ना कोई निर्माण कार्य हुआ, यहां तक की फैक्ट्रियां भी बंद रहीं। इतनी अनुकूल परिस्थितियों के बाद भी वर्ष 2020 में शहर में वायु प्रदूषण का स्तर वर्ष 2019 जितना ही रहा।

हालांकि, राहत की बात यह है कि पीएम-10 की तुलना में पीएम-2.5 के स्तर में थोड़ी कमी दर्ज की गई।

आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2020 में अप्रैल से लेकर अगस्त तक वायु प्रदूषण का स्तर निर्धारित मानक से काफी कम रहा, लेकिन जनवरी से मार्च और सितंबर से लेकर दिसंबर तक हवा इतनी प्रदूषित रही कि वायु प्रदूषण का स्तर पिछले वर्ष तक जा पहुंचा।

इन कारणों से बढ़ता है वायु प्रदूषण
सड़कों पर मौजूद धूल के कारण पीएम-10 का स्तर ज्यादा बढ़ा। नियमित सफाई और कलेक्शन के अभाव में सड़कों पर धूल जमा रही।
शहर के कई इलाकों में फुटपाथ कच्चे हैं। यहां तक की मुख्य मार्ग से जोड़ने वाले पहुंच मार्गों की स्थिति भी जर्जर है। इसके अलावा शहर के आसपास संचालित क्रेशर से निकलने वाली धूल भी पीएम-10 का स्तर बढ़ाती है।

इन उपायों से कम होगा प्रदूषण
सड़कों की पैच रिपेयरिंग: लाइन डालने के लिए जब भी सड़कें खोदी जाएं, निर्धारित अवधि में उनकी पैच रिपेयरिंग कराई जाए। पक्के फुटपाथ बनाए जाएं और पहुंच मार्ग को भी मुख्य मार्ग की तर्ज पर तैयार किया जाए।
वाहनों की फिटनेस : शहर में बड़ी संख्या में डीजल वाहन चल रहे हैं, जो 15 साल से ज्यादा पुराने हैं। सभी वाहनों की फिटनेस चैक कराई जाए। सीएनजी और इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए।
फुव्वारे चालू किए जाए: शहर के जिन प्रमुख चौराहों पर फुव्वारे हैं, उन्हें चालू कराया जाए। फुव्वारे से निकलने वाले पानी से आसपास के वातावरण में नमी बनी रहेगी , जिसके कारण धूल के कण का हवा में प्रसार नहीं हो सकेगा।
फैक्ट्रियों में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाए जाएं : शहरी क्षेत्र में स्थित फैक्ट्रियों में अनिवार्य रूप से प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाने चाहिए। यह उपकरण प्रदूषित हवा में से प्रदूषक तत्वों को रोक लेते हैं।
जैविक खाद बनाई जाए: कचरे को खुले में जलाने के स्थान पर उसकी जैविक खाद बनाई जाए। इससे प्रदूषण कम होगा व खाद के उपयोग से जमीन की उर्वरता बनी रहेगी।
-जैसा जीवाजी यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ.हरेंद्र शर्मा ने दैनिक भास्कर को बताया।

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