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कोरोना की दूसरी लहर:मानसिक रोगी हुए दोगुना, बच्चों और युवाओं पर ज्यादा असर

ग्वालियर23 दिन पहलेलेखक: अभिषेक द्विवेदी
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  • मानसिक आराेग्यशाला में पहले पहुंचते थे रोज 50 से 70 मरीज, अब 100 से 150

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में पहली ककी तुलना में लोगों की मानसिक समस्याएं दो से तीन गुना तक बढ़ी दी हैं। नतीजा, प्रदेश की इकलौती मानसिक आरोग्यशाला (मेंटल हॉस्पिचल) ग्वालियर की आेपीडी में पहली लहर के दौरान रोजाना 50 से 70 लोग अपनी समस्या लेकर पहुंचते थे, वहीं दूसरी लहर में ये संख्या 100 से 150 तक पहुंच गई है। इसमें अधिकतर बच्चे और युवा शामिल हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे लोगोंं में एंजाइटी, डिप्रेशन, एक्यूट स्ट्रेस रिएक्शन, पैनिक अटैक, पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर और सीजोफ्रेनिया जैसी बीमारियां शामिल हैं। गंभीर रोगियों के साथ सामान्य मानसिक रोगों जैसे एंजाइटी, नींद न आने और डिप्रेशन जैसी समस्या के मरीज भी इलाज के लिए आने लगे हैं। इन्हें दवाओं के साथ-साथ मनोचिकित्सक की काउंसिलिंग भी दी जा रही है।

पहली-दूसरी लहर के रोगियों में अंतर पहली लहर: लोगों को यह डर था कि संक्रमित हो गए तो लोग क्या कहेंगे। इसके तनाव के कारण भूख न लगना, नींद न आना जैसी समस्या होती थी। दवाओं के साथ काउंसिलिंग से इनका इलाज किया जाता था। दूसरी लहर : कोरोना से किसी प्रियजन को खोेने, अंतिम दर्शन न कर पाने का दु:ख दूसरों से साझा न कर पाने से लोग डिप्रेशन में जा रहे हैं। कई लोगों में सीजोफ्रेनिया और पोस्ट ट्रोमेटिक स्ट्रेश डिसऑर्डर की स्थिति देखी जा सकती है।

इन कारणों से बढ़ी समस्या

कई मरीजों में पोस्ट ट्रोमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर की समस्या देखी जा रही है। ये समस्या उन लोगों में है जो कोराना संक्रमण के इलाज के दौरान आईसीयू में रहे है। ठीक होने के बाद भी उन्हें वहां की घटनाएं याद आने से नींद नहीं आती है। इसे गंभीरता से न लेने पर सीजोफ्रेनिया हो सकता है। इसमें व्यक्ति के मन में आत्महत्या का विचार तक आने लगता है। दूसरी लहर में ऐसे मरीजों में से 2% को भर्ती करना पड़ा। {ऐसे लोग जो खुद या परिवार का कोई सदस्य किसी हादसे का शिकार हुआ, अथवा कोरोना संक्रमण के दौरान नौकरी चले जाने से परेशान हैं।

20 से 40 वर्ष के युवा ज्यादा

^कोरोना की दूसरी लहर में मरीजों की संख्या दो से तीन गुना हुई है। इसमें भी 20 से 40 वर्ष के युवा ज्यादा हैं। जबकि पहली लहर में सभी आयुवर्ग के लोग थे। मानसिक समस्या से जूझ रहे लोागों को इस बात का अहसास कराना जरूरी है कि वे अकेले नहीं हैं।
- डॉ. संजय लहारिया, वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ, मानसिक आरोग्यशाला

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