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अहम आदेश:नाबालिग आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता: हाई कोर्ट

ग्वालियरएक महीने पहले
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ग्वालियर बेंच ने नाबालिग आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ देने के संबंध में अहम आदेश दिया - Dainik Bhaskar
ग्वालियर बेंच ने नाबालिग आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ देने के संबंध में अहम आदेश दिया
  • किशोर न्याय अधिनियम-2015 में गिरफ्तारी की मंशा नहीं

मप्र हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने नाबालिग आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ देने के संबंध में अहम आदेश दिया है। इस न्याय बिंदु को स्पष्ट करते हुए जस्टिस शील नागू और जस्टिस राजीव श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने आदेश में कहा, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम -2015 में विधायन की मंशा नाबालिग की गिरफ्तारी की नहीं है। नाबालिग को ना तो हिरासत में लिया जाता है और ना ही जेल में बंद किया जाता है, बल्कि संप्रेक्षण गृह में रखा जाता है। ऐसे में आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता।

दरअसल, 4 जून 2020 को पुलिस थाना डबरा देहात में दुष्कर्म का प्रकरण दर्ज किया गया, जिसमें ग्वालियर के नाबालिग को सहआरोपी बनाया गया। गिरफ्तारी से बचने के लिए नाबालिग ने जमानत का आवेदन पेश किया लेकिन किशोर न्याय बोर्ड ने उसे खारिज कर दिया। इसकी अपील विशेष न्यायाधीश के समक्ष की गई, लेकिन वहां से भी नाबालिग को राहत नहीं मिली।

इसके बाद नाबालिग ने एडवोकेट शैलेंद्र कुशवाह के माध्यम से हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की। वहीं, एक अन्य नाबालिग की ओर से भी अग्रिम जमानत याचिका दायर की गई थी। चूंकि, पूर्व में ऐसे ही एक मामले में हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने नाबालिग आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ दिया था, वहीं इंदौर बेंच ने नाबालिग आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

बेंच के मत में अंतर के चलते सिंगल बेंच ने कहा कि यह याचिका प्रचलन योग्य है या नहीं, इसका निर्णय वृहद पीठ (लार्जर बेंच) द्वारा किया जाए। इसके बाद मामले की सुनवाई डिवीजन बेंच में हुई। 22 दिसंबर को बहस पूरी होने के बाद कोर्ट ने इस मामले को आदेश के लिए सुरक्षित रख लिया था। इस मामले में शासन की ओर से पैरवी अतिरिक्त महाधिवक्ता अंकुर मोदी ने की।

किसी प्रकार की याचिका दायर नहीं कर सकते

स्पष्ट किया कि न केवल सीआरपीसी की धारा 438 में दायर की जाने वाली अग्रिम जमानत याचिका प्रचलन योग्य नहीं मानी जाएगी, बल्कि सीआरपीसी की धारा 482 और संविधान के अनुच्छेद 226 में दायर होने वाली रिट याचिका में भी गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग नहीं की जा सकती।

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