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हाइड्रोलिक प्लेटफाॅर्म से हुए हादसे का आज एक साल पूरा:महाराज बाड़ा क्रेन हादसे में जान गंवाने वाले निगम कर्मचारियों के परिजन को एक साल में भी नहीं मिल सकी स्थायी नौकरी

ग्वालियर3 महीने पहलेलेखक: अनिल पटैरिया
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महाराज बाड़ा पर हुए हाइड्रोलिक प्लेटफाॅर्म (क्रेन) हादसे को रविवार 14 अगस्त को एक साल पूरा हो जाएगा, लेकिन हादसे में जान गंवाने वाले निगम कर्मचारियों के परिवार के जख्म नहीं भर सके हैं। - Dainik Bhaskar
महाराज बाड़ा पर हुए हाइड्रोलिक प्लेटफाॅर्म (क्रेन) हादसे को रविवार 14 अगस्त को एक साल पूरा हो जाएगा, लेकिन हादसे में जान गंवाने वाले निगम कर्मचारियों के परिवार के जख्म नहीं भर सके हैं।

महाराज बाड़ा पर हुए हाइड्रोलिक प्लेटफाॅर्म (क्रेन) हादसे को रविवार 14 अगस्त को एक साल पूरा हो जाएगा, लेकिन हादसे में जान गंवाने वाले निगम कर्मचारियों के परिवार के जख्म नहीं भर सके हैं। यह हादसा इन तीन परिवारों की दर्द भरी कहानी बनकर रह गया है। परिवार के सदस्यों के आंसू सूखने का नाम नहीं ले रहे हैं। परिजन कहते हैं कि हादसे में बेटा, पति खो दिया। वे अपने फर्ज के लिए कुर्बान हो गए लेकिन दोषियों को न सजा मिली और न जान गंवाने वालों के बारिसों को स्थायी नौकरी दी गई। हादसे के बाद घटनास्थल पर पहुंचे मंत्रियों और नगर निगम के अफसरों ने उनसे स्थायी नियुक्ति का वादा किया था।

इसे भूलकर शासन के नियम-कायदे बताकर आउटसोर्स (ठेके) पर नौकरी लेने को मजबूर कर रहे हैं। गौरतलब है कि 14 अगस्त 2021 को महाराज बाड़ा स्थित डाकघर की इमारत पर तिरंगा झंडा लगाने के दौरान हुए हादसे में निगम के कर्मचारी प्रदीप राजौरिया, कुलदीप दंडौतिया और विनोद शर्मा की जान चली गई थी। हादसे के बाद फायर ऑफिसर उमंग प्रधान पहले फरार रहे, अब निगम के अधिकारी बताते हैं कि वह कोर्ट से जमानत पर हैं। हालांकि अभी निगम में नौकरी ज्वॉइन नहीं की है।

तीन परिवार तीन कहानियां... पीड़ितों का दर्द उनकी जुबानी

कुलदीप की मां की पीड़ा..
अफसरों की लापरवाही से बेटा कुर्बान, अब नौकरी के लिए वे हमें नियम बता रहे हैं
कुलदीप की मां सुनीता शनिवार को पति और बहू पिंकी के साथ ग्वालियर आईं थीं। उनकी आंखों में भरे आंसू पीड़ा व दुख की कहानी बयां कर रहे थे। वे कहती हैं-मेरा दर्द न अफसर सुन रहे हैं और न जनप्रतिनिधि। बेटा फर्ज के लिए कुर्बान हो गया। उस वक्त मुंह तक अफसरों ने नहीं देखने दिया। कुलदीप का छोटा बेटा रात में पापा की याद करता रहता है। घटना वाले दिन मंत्री और अफसर स्थायी नौकरी की बात कर रहे थे। अब आयुक्त किशोर कन्याल नियम बताकर कह रहे हैं कि विनियमित को आउटसोर्स पर नौकरी मिलेगी। मेरे बुढ़ापे का और बच्चों के भविष्य का सहारा छीनने वाले निगम के अफसर दोषी हैं। उन पर एक साल में कोई एक्शन नहीं लिया गया।

प्रदीप राजौरिया की मां का दर्द...

बहू ने 10 महीने दफ्तर के चक्कर काटे मजबूरी में आउटसोर्स पर नौकरी पाई
हादसे में जान गंवाने वाले निगम के कर्मचारी प्रदीप राजौरिया की मां रमा घर की देखरेख में जुटीं थीं। हादसे का जिक्र होते ही उनकी आंखों से आंसू निकलने लगे। रोते-रोते वह कहती हैं- निगम के लिए जान देने वाले बेटे की बहू हिमांशी को स्थायी नौकरी के लिए अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काटे। जनप्रतिनिधियों से भी मिले, लेकिन किसी ने न्याय नहीं दिया।

प्रदीप का एक छोटा बेटा है। उसके भविष्य की चिंता में बहू हिमांशी ने आउटसोर्स पर ही नौकरी कर ली। पिछले महीने से ही नौकरी पर जाना शुरू किया है। छोटे बच्चे को छोड़कर नौकरी पर जाती है। अफसरों से न्याय की उम्मीद थी। घर में एक साल से कोई त्योहार तक नहीं मना है, जबकि ऐसे मामले में सरकार को मदद कर स्थायी नौकरी देना चाहिए।

विनोद शर्मा की पत्नी की आंखों में आंसू...

महीनों से कोई निगम अफसर सुध लेने नहीं आया, बेटे को अभी तक नहीं दी गई नौकरी
लक्ष्मीबाई कॉलोनी स्थित गंगादास की शाला परिसर में नगर निगम के पूर्व कर्मचारी विनोद शर्मा एक छोटे से घर में रहते थे। जब भास्कर टीम उनके घर पहुंची ताे पत्नी अनीता की आंखाें में उनकी तस्वीर काे देखकर आंसू आ गए। उन्हाेंने कहा कि वे 35 साल से निगम में काम कर रहे थे, लेकिन उनके जाने के बाद मेरे बेटे काे अभी तक नौकरी नहीं मिली है।

बेटे की दसवीं की मार्कशीट आने के बाद नौकरी देने का वादा अफसराें ने किया है। हादसे के बाद एक-दो दिन निगम के अधिकारी घर आते रहे, लेकिन महीनाें से कोई सुध लेने नहीं आया। हादसे के बाद हमसे कहा गया था कि शहीद का दर्जा दिया जाएगा। ऐसी कोई प्रक्रिया तक शुरू नहीं की गई है। दोषियों पर भी सख्त से सख्त कार्रवाई होना चाहिए।

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