पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

आत्मनिर्भरता:कोरोना ने स्कूल बंद कराया तो वर्कशॉप ने दिलायी पहचान, किसी ने सिलाई सेंटर खोला तो किसी ने खोली दवा दुकान

नवीन कश्यप | रघुनाथपुर19 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • कानून का सम्मान करते हुए स्वावलंबन के रास्ते पर

लॉकडाउन में शैक्षणिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की जीवनशैली ही बदल दी। कभी समय था जब सुबह उठने के बाद स्कूल जाने और शिक्षक-शिक्षिकाओं समेत बच्चों की चिंता सताती थी। लेकिन, कोरोनाकाल में इससे जुड़े कई लोगों ने अपना रास्ता ही बदल दिया। इन्हीं में से एक सिसवन प्रखंड के सुभहाता निवासी युवा तथा प्राइवेट स्कूल संचालक कुंदन सिंह हैं। लगातार हो रहे नुकसान के बाद उन्होंने अब स्कूल ही बंद कर दिया है। अब उन्होंने बाइक मरम्मत की गैराज खोल ली। स्कूल के बजाय अब गैराज में उन्होंने कई लोगोंे को रोजगार दिया है। उनके स्कूल में काम कर रहे शिक्षक-शिक्षकाओं ने भी इस लाइन से ही तोबा कर ली। किसी ने सिलाई सेंटर खोल ली तो कोई पिता की क्लिनिक में कंपाउंडर है। इसी तरह अन्य साथी भी आत्मनिर्भरता की राह पर चल पड़े।

2020 में स्कूल बंद होने के बाद अरमानों पर फिरा पानी
कुंदन बताते हैं कि चार वर्ष पहले रघुनाथपुर प्रखंड के टारी बाजार के पास लीज पर जमीन लेकर स्कूल खोला था। दर्जनों युवा-युवतियों को स्कूल में रोजगार दिया था। दूर-दराज के बच्चे पढ़ने आया करते थे। आधा दर्जन वाहन मालिकों को भी इस स्कूल की ख्याति से बच्चों को लाने ले जाने का कारोबार मिल चुका था। लेकिन वर्ष 2020 के शुरू में करोना महामारी ने अरमानों पर पानी फेर दिया। लॉकडाउन के दौरान राज्य सरकार के आदेशों के अनुसार पढ़ाई भी बंद हो गयी। स्कूलों पर ताले लटक गए। महीनों बाद स्कूल खुला सभी ने मिलकर फिर से मेहनत शुरू की। लेकिन महामारी का दौर मात्र दो महीने स्कूल चलने के बाद फिर से दस्तक दे दी। बंद पड़े स्कूल की साफ-सफाई तथा अन्य व्यवस्थाएं करने में लाखों रुपए नुकसान हो गया। बंद स्कूल में चोरों ने कीमती सामान भी चुरा ली।

कुशल कामगारों को मिली राेजी-रोटी
इसी दौरान पिता तारा बहादुर सिंह की मौत हो गयी। इस विपदा के दौरान परिवार तथा जानने वालो ने काफी हौसला दिया। वह युवा हार मानने वाला नहीं था। पिता की मौत के बाद स्टेट हाईवे माझी-गुठनी पथ पर नेवारी के समीप बंद पड़े अपने गैरेज को पुनः चालू करने की ठान ली। गाइडलाइन में गैरेज को खोलने की छूट भी मिल चुकी थी। आज यहां दर्जनों क्षेत्रीय कुशल कामगारों को रोजी-रोटी मिल चुकी है। अब इस स्टेट हाइवे से गुजरने वाली छोटी बड़ी तमाम गाड़ियों का एक बड़ा वर्कशॉप भी बन चुका है। इसका संचालन कुंदन खुद करता है। कुंदन के इस फैसले को देख अन्य युवाओं में भी कुछ कर गुजरने की विचारधारा पनपने लगी। उसी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक भी गांव में रोजगार शुरू कर चुके हैं। भांटी के अमरेन्द्र पाण्डेय अपने पिता की क्लिनिक में कंपाउंडर हैं। कचनार के सोनु सिंह दवा दुकान, पिपरा की अनामिका होम ट्यूशन, भागर की रानी सिलाई सेंटर चलाकर आत्मनिर्भर बनाने के रास्ते पर है।

सरकार के भरोसे कभी नहीं कर सकते प्रगति
आपदा के दौरान कानून का सम्मान करने के साथ खुद को स्वावलंबी बनाने की सोच हर एक लोगों में होनी चाहिए। हम सब कुछ सरकार के भरोसे छोड़ कभी भी प्रगति के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकते न ही अपने परिवार की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हैं।
कुंदन

खबरें और भी हैं...