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मंदिरों की दुर्दशा:सनकुआं के मंदिरों का दर्शन करने में हादसे का जोखिम, फिर भी बड़ी संख्या में पहुंच रहे श्रद्धालु

सेंवढ़ा19 दिन पहले
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  • सामाजिक कार्यकर्ताओं की पेशकश पर नगर परिषद ने कहा- नहीं दी जा सकती अनुमति
  • एक माह पहले आई बाढ़ में हुए थे क्षतिग्रस्त, धर्मस्व विभाग ने नहीं बनाई योजना

एक माह पहले सनकुआं पर आई बाढ़ के कारण कई प्राचीन मंदिर, मठ और आश्रम क्षतिग्रस्त हो गए थे। इन मंदिरों के भवनों के आसपास की मिट्टी दरक जाने के कारण अब उनका बेस पूरी तरह हवा में है। ऐेसे में अधिक बारिश के कारण कभी भी यह गिर सकते है। बावजूद इसके मंदिरों पर दर्शनों के लिए रोज सैकड़ों लोग यहां पहुंच रहे है। लोगों के जोखिम उठाने का यह सिलसिला लगातार जारी है। अभी तक धर्मस्व विभाग ने इन मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए कोई योजना नहीं बनाई है।

दूसरी ओर स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता भी मंदिरों के निर्माण में आर्थिक सहयोग करने के लिए तैयार हैं, पर नगर परिषद ने उनको अनुमति देने से इंकार करते हुए कह दिया है कि धर्मस्व विभाग के शासकीय अभिलेख में दर्ज होने के कारण अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसे में मंदिरों की यह हालत कितने समय तक रहेगी और आने वाले दिनों में पर्व स्नान मेलों के समय कैसे लोग इस असुरक्षित माहौल में दर्शन करेंगे यह सवाल चिंता का विषय बना हुआ है।

सनकुआं पर स्थित प्राचीन मंदिरों को लेकर समूचे अंचल में गहरी आस्था है। यहां पर्व स्नान के अलावा आने वाले दिनों में मोरछठ मेला, डोलग्यारस पर्व, कार्तिक पूर्णिमा मेला सहित अनेक उत्सव आयोजित होंगे। वैसे तो प्रतिदिन मंदिरों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है पर उत्सवों के दौरान आसपास के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्र से भी लोग आते है। जब इनकी संख्या बढ़ेगी तो दर्शनों के दौरान घटनाओं के प्रति आशंका भी बड़ जाएगी। ऐसे में आवश्यक यह है कि धर्मस्व विभाग अथवा स्थानीय लोग मंदिरों को बचाने हेतु प्रयास करें।

सबसे पहले मंदिरों को बचाने के लिए उनके नीचे की धसकती मिट्टी और पहाड़ को रोका जाए और इसके बाद मंदिरों के भवन को दुरुस्त कर उनका जीर्णोद्धार करवाया जाए। अंत में रंगरोगन कर मंदिरों को आकर्षक बनाया जाए। नियमानुसार धर्मस्व विभाग को इसके लिए राशि जारी करनी होती है। पर इसके पहले प्रशासन की सर्वे रिपोर्ट एवं लोक निर्माण विभाग के माध्यम से एस्टीमेट बनाया जाना आवश्यक है। पर एक माह गुजरने के बाद केवल प्रभावित मंदिरों की सूचि ही बनी है। न तो अभी तक मंदिरों का जीर्णोद्धार में होने वाले खर्च का आकलन हुआ और नहीं इसका प्रस्ताव भेजा गया है। ऐसे में मंदिर कब तक तैयार होंगे यह कह पाना भी मुश्किल है।

इन मंदिरों को आ रही समस्या

सबसे अधिक समस्या गूदरिया मठ हनुमान मंदिर को लेकर है। इस मंदिर के गर्भग्रह तक पहुंचने का रास्ता पूरी तरह दरक गया है। मूर्ति के आसपास की दीवालों में दरार आ चुकी है। नदी से सटा यह मंदिर लगातार मिट्टी के क्षरण होने पर कभी भी ढह सकता है। दुर्गागिरी के डांढ़े के नीचे पहाड़ पूरी तरह गिर गया है।

मंदिर के बेसमेंट के पिलर हवा में दिख रहे है। हालांकि मंदिर अभी पूरी तरह सुरक्षित है। पर बेस न होने के कारण यह भी कभी भी गिर सकता है। काली माता मंदिर का शिखर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। मंदिर के भवन को भी काफी क्षति हुई है। इसका जीर्णोद्धार एवं चोटी लगाया जाना अति आवश्यक है। कई ओर मंदिर है जिनके शिखर चोटी और चबूतरे गिर चुके हैं।

जीर्णाेद्धार कई सामाजिक संस्थाएं कर रहीं पहल
आरएसएस के तहसील संघ चालक विनोद गुप्ता के अनुसार सामाजिक कार्यकर्ता सतीष पाठकार समेत, डाॅ. अरूण तिवारी समेत अनेक लोगों के प्रस्ताव है। हम सभी इन मंदिरों को बचाने के लिए हर संभव सहयोग देने के लिए तत्पर है। इसी प्रकार शनिदेव मंदिर समिति की ओर से हेमन्त अग्रवाल ने भी एक अभियान चलाकर मंदिरों के पुर्ननिर्माण एवं उनके दोबारा से रंगरोगन एवं जीर्णोद्धार के लिए पेशकश की थी। कई लोग इस अभियान में जुड़ना चाहते है।

जीर्णोद्धार के लिए किया जाएगा विचार

  • नियमानुसार जो मंदिर धर्मस्व विभाग के शासकीय अभिलेख में दर्ज होते है। उनके जीर्णोद्धार के लिए धर्मस्व विभाग से ही राशि का आवंटन होता है ऐसा नियम है। इसलिए अनुमति नहीं दी गई। हालांकि लोगों की भावनाओं के अनुरूप एक बार फिर से विचार किया जा रहा है। - महिपाल सिंह यादव, प्रभारी सीएमओ सेंवढा

पहली पेशकश ही ठुकराई
नगर के सामाजिक कार्यकर्ता मंदिरों के जीर्णोद्धार को लेकर काफी प्रयासरत है। पर इसके लिए नगर परिषद से अनुमति एक प्रमुख समस्या है। इस दिशा में सबसे पहला प्रयास भिंड के पूर्व सीएमएचओ डाॅ. विनोद सक्सेना ने की। उनके प्रस्ताव की प्रति को लेकर पुष्पेंद्र सक्सेना ने 15 दिन पहले एसडीएम सेंवढ़ा को आवेदन दिया।

एसडीएम द्वारा नगर परिषद को अनुमति से संबंधित प्रक्रिया चलाने के निर्देश दिए पर बीती 27 अगस्त को नगर परिषद द्वारा अनुमति देने से इंकार करते हुए जबाब दिया गया। जिसमें स्पष्ट किया गया कि मंदिर धर्मस्व विभाग के अभिलेख में है। पुजारी को वेतन मिलता है। इसके जीर्णोद्धार का कार्य धर्मस्व विभाग ही करेगा इसलिए अनुमति नहीं दी सकती। डॉ. सक्सेना के अनुसार गूदरिया सरकार मंदिर का पूर्व में भी उनके पुरखों द्वारा भी निर्माण करवाया गया था। उनके पूरे परिवार की इसमें गहरी आस्था है। अगर प्रशासन की अनुमति मिलती तो वह खुद के खर्च पर यह कार्य कर सकते थे।

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