सरोवर में लगाई आस्था की डुबकी:बैतूल जिले में यम, शनि की बहन ताप्ती के घाटों पर भीड़

बैतूलएक महीने पहले
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ताप्ती नदी के सरोवर में स्नान करते श्रद्धालु। - Dainik Bhaskar
ताप्ती नदी के सरोवर में स्नान करते श्रद्धालु।

बैतूल के मुलताई में शनिवार को भाईदूज पर श्रद्धालुओं की जमकर भीड़ जुटी। पवित्र ताप्ती सरोवर पर श्रद्धालुओं ने भाईदूज कार्तिक मास शुक्लपक्ष द्वितीया के दिन पूजा-अर्चना की। सूर्यपुत्री और शनि, यम की बहन ताप्ती कहलाती है। इसी वजह से यहां लोगों ने सरोवर पर डुबकी लगाई।

पंडित विश्वकसेन देशमुख ने बताया कि इस दिन हर बहन अपने भाई को कुमकुम, अक्षत से तिलककर भाई के दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन ताप्ती ने अपने भाई शनि और यम से वचन मांगा था कि उसके तट पर आएं। भाई और बहन यदि तिल मिश्रित तापीजल से स्नान करें और तिल मिश्रित ताप्ती का जल ताबे के लोटे में भरकर दान करें। तो स्नान से शनिदोष साडे़ साती के कष्ट समाप्त होंगे और जल के दान से यम सायुज्य मुक्ति प्रदान करेंगे।

दूज का चंद्र दर्शन होने पर करें अर्चना

यदि कोई भाई-बहन दूर है या किसी बहन का भाई नहीं है तो वो शनि, यम, चंद्र से प्रार्थना कर सकते हैं। गोवर्धन पूजा के दूसरे दिन मनाया जाने वाले इस पर्व पर अनेक पौराणिक और जनश्रुति पर आधारित कहानियां प्रसिद्ध हैं। इसमें शनि-यम बहन ताप्ती की कहानी भी प्रसिद्ध है।

ताप्ती और शनि, यम का बहुत प्रेम था वह अपने भाइयों को हमेशा भोजन के लिए बुलाती थीं। पर दोनों भाई व्यस्तता के कारण अपने बहन के यहां नहीं जा पाते थे। एक समय ताप्ती माता ने अपने दोनों भाइयों को कार्तिक मास की दूज को आमंत्रित किया।

तब शनि ने सोचा मै सभी को पीड़ा देता हूं। इसलिए मुझे कोई नहीं बुलाता, यम ने सोचा मैं सबके प्राणों का हरण करता हूं। इसलिए मुझे कोई नहीं बुलाता। हमारी बहन ताप्ती मुझे इतने दिनों से बुला रही है। हमें उसके यहां जाना चाहिए।

ऐसी मान्यता है कि शनि ने तापी के घर पर आकर सभी शनि पीड़ित जनों को अपनी पीड़ा से मुक्त कर दिया। यमराज ने सभी ताप्ती स्नान करने वालों को नर्क के द्वार से वापस भेज कर यम मार्ग से मुक्ति प्रदान की।

शनि, यमराज को आता देखकर तापी प्रसन्न हो गई। उनकी पूजा कर उनके व्यंजन खिलाए और सत्कार किया। मां ताप्ती के द्वारा किए आतिथ्य से दोनों भाई प्रसन्न हुए और वरदान मांगने के लिए कहा।

फिर ताप्ती ने वर मांगा कि आप दोनों कार्तिक शुक्ल दूज के इस दिन हर साल मेरे घर आया करो और उसकी तरह जो बहन-भाई का आदर सत्कार कर टीका करे, उसे शनि पीड़ा कभी न हो। यम का भय न रहे। दोनों भाइयों ने तथास्तु कहकर ताप्ती को अमुल्य वस्त्राभूषण प्रदान किए और वापस अपने लोकों में लौट गए। उसी दिन से भाईदूज की परंपरा का निर्वाह प्रारंभ हुआ।