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363 नर-नारियाें ने दी थी जान:विश्नाेई नहीं जलाते हाेली, काेरकू गिरते डांडे से पता लगाते हैं कैसी हाेगी बारिश

हरदाएक महीने पहले
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खेजड़ली के पेड़ काे बचाने के लिए उससे लिपटकर विश्नाेई समाज के 363 नर-नारियाें ने अपनी जान दे दी थी। इसी कारण पर्यावरण प्रेमी यह समाज हरे पेड़, लकड़ी की हाेली नहीं जलाता। हाेलिका दहन हाेने पर सूतक माना जाता है। सुबह स्नान कर हवन से घर पवित्र करते हैं।

नीमगांव के 100 साल पुराने जंभेश्वर मंदिर में भी सामूहिक हवन हाेता है। फिर प्रहलाद के सुरक्षित बचने की खुशी में गले मिलकर मिठाई बांटते हैं। इस दिन भाेजन में सादा खिचड़ा पकता है। खास बात यह है कि जिस वक्त लोग होली मनाते हैं तब विश्नोई समाज के लोग मंदिर में सामूहिक हवन कर पाहल ग्रहण करते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता वेद विश्नोई बताते हैं कि हवन पाहल के बाद होली के दिन प्रहलाद- चरित्र सुनाया जाता है। सतयुग में स्थापित प्रहलाद-पंथ के स्थापना दिवस के रूप में विश्नाेई समाज होली काे सात्विक रूप से मनाता है। बिना रंग-गुलाल, मिठाई बांटकर त्याेहार मनाते हैं। माेहन विश्नाेई बताते हैं कि होलिका दहन से पूर्व जब हाेलिका प्रहलाद को गोद में लेकर बैठती है, तभी से शोक शुरू हो जाता है।

सुबह प्रहलाद के सुरक्षित बचने पर खुशी मनाते हैं। कलयुग में संवत 1542 कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी को भगवान जंभेश्वर ने कलश की स्थापना कर पाहल पिलाकर विश्नोई पंथ बनाया था। जांभाणी साहित्य के अनुसार तब के प्रहलाद पंथ के अनुयायी ही आज का विश्नोई समाज है।

त्रेता युग से चली आ रही प्रहलाद पंथ की परंपरा

ऐड़ाबेड़ा निवासी 75 वर्षीय जगदीश सांई बताते हैं कि ग्रंथों में ऐसा उल्लेख है कि प्रहलाद की वापसी पर हवन कर कलश की स्थापना की थी। ऐसी मान्यता है, होली पर स्थापित प्रहलाद पंथ आगे चलकर हरिशचंद्र ने त्रेता युग में पुन: स्थापित किया। द्वापर में युधिष्ठिर ने इसी पंथ को स्थापित किया। कलयुग में विष्णु अवतार गुरु जांभोजी ने इसी पंथ को पुन: स्थापित किया।

काेरकू समाज आज छाेटी, कल बड़ी हाेली जलाएगा

हरदा. कोरकू जनजाति में दाे दिन हाेली जलाई जाती है। पहले दिन छाेटी, दूसरे दिन बड़ी हाेली जलेगी। रंग-गुलाल पांच दिन तक खेला जाता है। पुरुष फगुनई गाते हैं। जलता हुआ होली का डांडा जिस दिशा में गिरता है, उससे वे बारिश व सालभर हाेने वाले शुभ-अशुभ का अंदाजा लगाते हैं।

ऐसे लगाते हैं अनुमान

कोरकू जनजाति पर शोध कर चुके डॉ. धर्मेंद्र पारे बताते हैं कि हाेली के डांडे का पूर्व-उत्तर में गिरना शुभ व दक्षिण-पश्चिम में गिरना अशुभ मानते हैं। जलती होली को पूर्व-उत्तर की ओर भी धकेला जाता है। ग्राम प्रमुख नए मटके में होली की राख लेकर ऊपर से 7 बार मोड़ा हुआ सफेद कपड़ा बांधकर नदी में इसे उलटा डालते हैं। इनसे निकले बुलबुले देखते हैं। बुलबुले पूर्व-पश्चिम दिशा में शुभ, दक्षिण-उत्तर में अशुभ मानते हैं। होली से नए कपड़े पहनने की शुरुआत होती है।

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