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हाेशंगाबाद में रामलीला कल से:60 साल बाद फिर सेठानी घाट पर सत्संग भवन के सामने होगा रामलीला का मंचन

हाेशंगाबाद9 दिन पहले
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  • सालों पहले जिस खंभे पर मशाल लटकी थी, इस बार वहीं हाेगी रामलीला

140 साल पुरानी रामलीला की परंपरा निभाने के लिए सत्संग भवन पर मंच तैयार हाे गया है। यहां 19 अक्टूबर (साेमवार) से रामलीला का मंचन होगा। आयोजन से जुड़े लोग और शहर के बुजुर्ग बताते हैं कि धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक त्रिवेणी बन चुकी इस रामलीला की शुरुआत 1870 के आसपास सेठ नन्हेलाल ने की थी। हालांकि 1885 से नियमित मंचन शुरू हुआ, जो अब तक जारी है।

रामलीला में राेशनी के लिए (लैंप लगाने) 1934 में काेलकाता से लाेहे के खंभे बुलवाए गए। इनमें लैंप काे मशाल और तेल से घुरू बनाकर जलाकर राेशनी करने का काम किया जाता था। 86 पहले तक रात में रोशनी करने के लिए सेठानीघाट पर खंभे पर चिमनी वाले लैंप लगाए गए थे।

भरत-मिलाप होता था अनूठा : हाेशंगाबाद के नावघाट पर अयोध्या नगरी बसाई जाती थी। वहां से भरत नाव में बैठकर राम-लक्ष्मण से मिलने सेठानी घाट आते थे। उस दौर में यह जीवंत लीला देखने बड़ी संख्या में लोग जुटते थे। इसी प्रसंग के कारण सेठानी घाट के उस गुर्जे (चबूतरे) का नाम भरत-मिलाप हो गया। अब इस बार फिर से काेराेना के चलते यह रामलीला संत्संग भवन के समाने हाे रही है।

रामलीला का मंच अभी सत्संग भवन के पास बना है। इसी मंच के पास 1934 में सेठ नन्हेलाल घासीराम के द्वारा लाए गए पाेल लगा है। इसकाे भी सुरक्षित रखा गया है।
-प्रशांत मुन्नू दुबे, रामलीला समिति सदस्य

आधा घंटे पहले आकर जगह तय करते थे दर्शक: खड्‌डर

रामलीला पहले सत्संग भवन के सामने हाेती थी। यहां लैंप और मशाल लगाकर राेशनी की जाती थी। रामलीला देखने के लिए लाेग आधा घंटे पहले ही आकर अपनी जगह तय कर लेते थे। घाट पर विशेष अभिनय राम-भरत मिलाप हाेता था। इसके कारण घाट के एक हिस्से का नाम ही राम-भरत मिलाप घाट हाे गया है। रामलीला देखने के लिए शहर में लाेगाें में उत्साह उस समय भी देखते बनता था। लाेगाें काे दिन भर शाम की लीला का इंतजार हाेता था। मंदिर के सामने लीला शुरू करने से पहले लैंप, जलाते थे।

उजाला हाेने पर अभिनय शुरू हाेता था। मंच पर पात्राें के आते ही लाेग खड़े हाेकर उन्हें प्रणाम किया करते थे। लीला के दाैरान राेशनी कम नहीं हाे इसके पूरे इंतजाम हाेते थे। करीब दाे घंटे रामलीला हाेती थी। 1960 के दशक में बिजली आने के बाद रामलीला का स्थान बदला और तिलक भवन के सामने हाेने लगी।
-आचार्य गाेपाल प्रसाद खड्डर, नर्मदा मंदिर, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक ने जैसा भास्कर काे बताया।

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