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कोरोना संक्रमण:डाॅक्टराें की कमी के चलते सैंपलिंग टीम के साथ 42 दिन से आठ घंटे नि:शुल्क सेवा दे रहा पंकज

बदनावर6 दिन पहले
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पंकज जायसवाल पीपीई किट पहनकर टीम का कर रहे सहयाेग। - Dainik Bhaskar
पंकज जायसवाल पीपीई किट पहनकर टीम का कर रहे सहयाेग।
  • घर के सदस्य संक्रमित ना हाे इसलिए किराये से कमरा लेकर रहने लगा, छाेटा भाई देने आता है भाेजन

कोरोना संक्रमण के समय शासकीय अस्पताल में डॉक्टरों की कमी काे देख नगर के युवा पंकज जायसवाल ने सैंपलिंग में सहयाेग करने की इच्छा जताई। डाॅक्टर की सहमति मिलने के बाद निस्वार्थ भाव से 26 अप्रैल से डॉ. केपी शेखावत के साथ रैपिड एंटीजन व आरटीपीसीआर टेस्ट एवं रजिस्टर मेंटेन करने में मदद कर रहा।

संक्रमण के पीक पर आने के समय लोग अस्पताल का नाम सुनकर घबरा रहे थे। ऐसे समय में तेज गर्मी में भी पीपीई किट पहनकर सुबह 9 बजे से अस्पताल पहुंचकर शाम 5 बजे तक पीपीई किट पहन कर आठ घंटे सेवा दी। जायसवाल ने बताया मई में हर दूसरा व्यक्ति पॉजिटिव निकल रहा था। उस समय मन में भय था कि कहीं मेरी वजह से मेरा परिवार संक्रमित नहीं हो जाए। इसके लिए चंद्रलीला पैलेस में किराए से कमरा लेकर रहने लगा। दिन भर सेवा के बाद शाम काे थक कर रूम पहुंचता हूं।

राेजाना सुबह-शाम छोटा भाई कुणाल जायसवाल भाेजन देने आता है। मरीजाें की स्थिति देख कर कई बार भोजन करने का भी मन नहीं करता था। प्रतिदिन 150 कोरोना संक्रमित लोगों की जांच डाॅक्टर और हम मिल कर करते थे। पीक समय में 50% से अधिक लोग संक्रमित आ रहे थे।

दिन में 2 बजे तक हॉस्पिटल में सेवा देने के बाद गांव में स्वास्थ्य विभाग के जांच शिविर में पहुंचकर सेवा देता था। संक्रमण काल में नानीजी, फूफाजी, जीजाजी एवं अन्य रिश्तेदारों की मौत की खबर सुनकर परिवार के लोग चिंतित थे। मैं भी अंदर से टूट गया था परंतु डाॅक्टर की कमी एवं लोगों की तकलीफ देख कर सुबह जल्दी तैयार होकर निकल पड़ता था।

जायसवाल पूर्व में भाजयुमाे जिला उपाध्यक्ष, आरएसएस के नगर कार्यवाह रह चुके हैं। जायसवाल नि:शुल्क सेवा देने के साथ खुद की कार में प्रतिदिन स्टाफ को लेकर अब तक 40 गांवाें में भ्रमण कर जांच में सहयाेग कर चुके हैं।
एक माह से नहीं गए घर
जायसवाल ने बताया बीच में जांच अधिकारी डाॅ. शेखावत संक्रमित हो गए थे। इसके पहले उन्होंने रैपिड एवं अारटीपीसीअार से जांच करना सिखाई थी। उनके माता-पिता भी संक्रमित हुए थे। पिता की ताे मौत भी हाे गई। उस समय सहयोगी डॉक्टर के साथ मिलकर पूरी व्यवस्थाओं को संभाला था। परिवार को लेकर चिंता भी बढ़ गई थी। इसलिए एक माह से घर भी नहीं पहुंचे।

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