नेशनल डाॅक्टर्स डे आज / बाइक हादसे में पैर की हड्डी 4 इंच हाे गई छाेटी, डेढ़ साल मुफ्त इलाज किया, अब खुद चल रहीं

In the bike accident, the foot bone was 4 inches, the treatment was free for one and a half years, now running on its own
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In the bike accident, the foot bone was 4 inches, the treatment was free for one and a half years, now running on its own

दैनिक भास्कर

Jul 01, 2020, 06:34 AM IST

देवास. निजी अस्पतालाें में इलाज के नाम पर मरीजाें से अमानवीयता के किस्से ताे आए दिन सामने आते हैं लेकिन कुछ किस्से ऐसे भी हाेते हैं जाे डाॅक्टरी धर्म की मिसाल बन जाते हैं। 
एेसा ही एक मामला अमाेना निवासी कांताबाई प्रजापति का है। बाइक हादसे में घायल हाेने के बाद वे पांच साल से चल नहीं पा रही थी। इंफेक्शन से जांघ की हड्डी चार इंच छाेटी हाे गई थी। उनके पति मजदूरी करते हैं, लंबा खर्च उठा पाने में परिवार सक्षम नहीं था। विनायक अस्पताल के डॉ. योगेश वालिम्बे, डॉ. अतुल गुप्ता, डॉ. केके धूत, डॉ. आरएल वर्मा ने डेढ़ साल में चार ऑपरेशन और फाॅलाेअप बिना एक रुपया लिए किया। दाे दिन पहले महिला अपने पैराें पर खड़ी हाे गई है। 
महिला की बेटी आस्था प्रजापति ने बताया पांच साल पहले पापा और मम्मी का बाइक एक्सीडेंट हुआ था। पापा ताे ठीक हाे गए थे, मम्मी की जांघ की हड्डी में फ्रेक्चर हाे गया था, जिसका वडाेदरा, उज्जैन, इंदाैर के अस्पतालाें में लंबा इलाज चला। पापा 300 रुपए राेज कमाते हैं। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। डाॅ. वालिम्बे सर ने हमारे लिए पहल की। फिर मुफ्त इलाज हुआ। आज मम्मी चल पा रही हैं। डाॅ. वालिम्बे ने बताया हम लाेगाें ने केस काे चुनाैती के रूप में लिया। जांघ की हड्डी में इंफेक्शन के कारण हड्डी छाेटी हाे गई थी। इसे इंफेक्टेड नान-यूनियन ऑफ फिमर (जांग की हड्डी) कहते हैं, जिसका इलाज मोनो लेटरल रेल तकनीक से बोन ट्रांसपोर्ट के जरिए किया गया। इसमें निश्चित अंतराल में चार अाॅपरेशन किए गए। एक-एक इंच हड्डी बढ़ाने के प्रयास किए। ऐसे मामलाें में ऑपरेशन फेल हाेने की भी संभावनाएं बनी रहती हैं। अस्पताल प्रबंधन के ओटी स्टाफ जितेंद्र पाटीदार, राकेश प्रजापत, एचआर अजय नागर आदि का विशेष योगदान रहा। 

डाॅक्टर ने वेंटिलेटर पर बेवजह डालने की भी भ्रांति दूर की 
वेंटीलेटर पर डालकर बेवजह बिल बनाने काे लेकर भी कई भ्रांति मरीजाें में हाेती है। इसी तरह के एक मामले में डाॅ. अश्विन साेनगरा ने वेंटीलेटर का खर्चा खुद उठाने का वचन देकर परिजन में भ्रांति दूर की। किस्सा एपेक्स हाॅस्पिटल का है। डाॅ. साेनगरा ने बताया रात 1 बजे मुझे बुलाया गया। 85 साल के बुजुर्ग थे। सांस की तकलीफ थी। दाे-तीन दिन से ज्यादा साे रहे थे और उस समय बिल्कुल रिस्पांड नहीं कर रहे थे। उनमें सीओटूनारकाेसिस बीमारी के लक्षण दिखे। शरीर में कार्बनडाई ऑक्साइड की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। वेंटीलेटर पर लेने की सलाह दी ताे परिजन काे लगा हम बिल बनाने के लिए कह रहे हैं। इस बीमारी काे वेंटीलेटर की कुछ सेटिंग से कुछ घंटाें में ठीक किया जा सकता है। मुझे विश्वास था ताे मैंने कहा यदि ठीक नहीं हुए ताे रात का वेंटीलेटर का चार्ज मैं दे दूंगा। तब परिजन तैयार हुए। तीन घंटे में वे हाेश में आ गए। अपने पैराें पर चलकर घर लाैटे।

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