मेहनत कर गुजारा कर रहा नेत्रहीन मिथुन:​​​​​​​देवास जिले में रोजना 11 किलोमीटर सफर तय कर कैलेंडर बेचने शहर आता है मिथुन

देवास4 दिन पहले
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कैलेंडर बेचता मिथुन। - Dainik Bhaskar
कैलेंडर बेचता मिथुन।

देवास में जब कुछ कार्य करने का जुनून सवार हो तो फिर वह आदमी कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता चाहे वह किसी भी परेशानी से जूझ रहा हो।

दरअसल रुपाखेड़ी निवासी मिथुन सिसोदिया नेत्रहीन होने के बाद भी अपनी आजीविका चलाने के लिए प्रतिदिन गांव से शहर पहुंचता है और शहर में भ्रमण कर कैलेंडर बेचता है। नेत्रहीन होने के बाद भी उन्होंने कभी हौसला नहीं खोया। मिथुन प्रतिदिन सुबह अपने गांव रुपाखेड़ी से शहर आने वाले लोगों की मदद से देवास पहुंचता है और फिर सुबह से शाम तक शहर के विभिन्न क्षेत्रों में पैदल भ्रमण कर कैलेंडर बेचता है।

मिथुन ने बताया कि वह मरेठी कांकड रुपाखेड़ी गांव से प्रतिदिन 11 किलोमीटर का सफर तय कर शहर आता है। शहर में विगत दो साल से कैलेंडर बेचकर अपना पालन-पोषण करता है। इसके पहले मिथुन शहर के एक प्रतिष्ठान पर कार्य करता था, लेकिन कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान उसे वहां से बंद कर दिया गया।

मिथुन 12वीं कक्षा तक पढ़ा है। यह शिक्षा उसने मप्र दृष्टिहीन कल्याण संघ से प्राप्त की है। फिलहाल मिथुन छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में है, लेकिन जब तक नौकरी नहीं मिलती तब तक वह इसी तरह से अपनी आजीविका चलाने के लिए यह कार्य करता रहेगा।

मिथुन अपने गांव से लोगों की मदद से शहर में पहुंचते हैं और प्रतिदिन करीब 10 से 20 कैलेंडर बेचते हैं। प्रति कैलेंडर की कीमत 40 रुपए प्रति नग है उस मान से करीब 500 से अधिक रुपए अपने गुजारे के लिए कमा लेते हैं। उनके घर में माता-पिता ओर एक भाई है, लेकिन भाई अलग रहता है। मिथुन अन्य काम भी जानता है, लेकिन नेत्रहीन होने से यह काम करने को बेबस है।

नेत्रहीन होने के बावजूद नहीं मिली कोई सहायता

मिथुन ने बताया कि नेत्रहीन होने के बावजूद शासन स्तर से कोई सहायता नहीं मिलती है। एक साल पहले कैलेंडर बेचते समय मिथुन भूलवश सांसद महेन्द्र सिंह सोलंकी के कार्यालय में जा पहुंचा। उसके बाद सांसद ने मुझसे कैलेंडर खरीदने के बाद 2 हजार रुपए की आर्थिक सहायता की थी।

इस दौरान मैंने सांसद से मदद मांगते हुए शहर में एक अस्थाई जगह दिलवाने की मांग की थी। जहां से मैं कैलेंडर बेच सकूं, लेकिन सांसद आश्वासन देकर भूल गए