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जिले में पहला प्रयोग:बारिश में भी बचे रहेंगे 2500 पौधे, ढलान होने से बह जाएगा पानी

धार7 दिन पहलेलेखक: सुनील उमरवाल
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मान डेम के टापू पर असम की झूम पद्धति की तर्ज पर पाैधाराेपण किया जाएगा। - Dainik Bhaskar
मान डेम के टापू पर असम की झूम पद्धति की तर्ज पर पाैधाराेपण किया जाएगा।
  • पहाड़ी क्षेत्राें में की जाती है इस तरह से खेती.. ताकि मिट्‌टी ना बहे और पौधों को भी नुकसान ना हो, नाव से पहुंच सकेंगे पर्यटक

जिले में एक और पर्यटक स्थल तैयार हो रहा है। ये जीराबाद के मान डेम के टापू पर बनाया जा रहा है। इसकी खासियत है कि यहां बारिश में भी पौधे खराब नहीं होंगे। जिले में इस तरह का पहला प्रयोग है, जहां पहाड़ी क्षेत्रों में की जाने वाली झूम खेती की तर्ज पर पौधों को जीवित रखने के प्रयास होंगे।

यहां 2500 पौधे लगाए जाएंगे। फिलहाल टापू को सीढ़ीदार बनाया जा रहा है। ये काम चार चरणों में किया जाएगा और खर्च एक करोड़ रुपए होंगे। पहले चरण में 60 मजदूरों ने टापू को सुरक्षित करने के लिए पत्थरों की बोल्डर वाॅल, जंगली घास और झाड़ियाें की सफाई कर दी है।

कुछ दिनाें में यहां पाैधे लगाकर पर्यटकाें के लिए बैठने के लिए कुर्सियां, एक हाल का निर्माण कर नाव से टापू तक पहुंचने की भी व्यवस्था की जाएगी। कलेक्टर आलाेक कुमार सिंह ने बताया इस टापू पर गाजर घास व जंगली झाड़ियां रहती थी।

आरईएस विभाग से माही डेम की तरह इसे विकसित कराया जा रहा है। टापू पर ताड़पाम, लिली, नारियल, फाेस्टलपाम, टाेपाइल, बाॅटलपाम, पाइकस सहित फूलाें के करीब 2500 पाैधे लगाए जाएंगे। 2 हेक्टेयर में फैला यह टापू बारिश में चारों तरफ पानी से घिर जाता है। टापू का काम पूरा होने के बाद पर्यटकाें के लिए यह एक तरह से नया अनुभव रहेगा।

चार चरण में होगा काम
आरईएस ईई विनोद दोहरे व गंधवानी एसडीओ वीरल पटेल ने बताया यहां चार चरण में काम किया जाएगा। पहले चरण में टापू की साफ-सफाई कर झूम पद्धति के लिए 30 बेड बना दिए हंै। फिर पौधे लगाए जाएंगे। शनिवार को कलेक्टर ने पौधा लगाकर शुरुअात की है। आगमी दिनों में बैठक व्यवस्था, माॅडल सुविधाघर व हाल का निर्माण किया जाएगा।

झूम पद्धति... नहीं बहती मिट्‌टी, बेकार का पानी नीचे चला जाता है
असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश में चाय के बागानों में इस तरह की खेती की जाती है। ज्यादा बारिश से फसल को नुकसान ना हो इसलिए पहाड़ी पर सीढ़ीदार खेत बनाए जाते हैं। ताकि बारिश होने पर भी पानी बह जाए और मिट्‌टी वहीं रहे। इससे फसल को कोई नुकसान नहीं होता है।

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