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देवशयनी एकादशी आज:4 महीने नहीं हाेंगे मांगलिक कार्य, 5 माह का हाेगा चातुर्मास

धार4 महीने पहले
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  • श्राद्ध पक्ष के बाद 20 से 25 दिन देरी से आएंगे सभी त्याेहार, 160 साल बाद बन रहा ऐसा योग

देवशयनी एकादशी 1 जुलाई को है। इसी दिन से चातुर्मास शुरू हो जाएगा। चार महीने शुभ काम वर्जित रहेंगे। देवशयनी से देवप्रबोधिनी एकादशी के बीच के समय को चातुर्मास कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य पं. अशोक शास्त्री ने कहा कि इस बार अधिक मास के कारण चातुर्मास पांच महीने का होगा। श्राद्ध पक्ष के बाद आने वाले सभी त्योहार लगभग 20 से 25 दिन देरी से आएंगे। 160 साल बाद ऐसा योग बन रहा।
इस बार आश्विन माह का अधिक मास है। मतलब दो आश्विन मास होंगे। इस महीने में श्राद्ध और नवरात्रि, दशहरा जैसे त्योहार पड़ते हैं। आमतौर पर श्राद्ध खत्म होते ही अगले दिन से नवरात्रि शुरू हो जाती है पर इस बार ऐसा नहीं होगा। 17 सितंबर को श्राद्ध खत्म होंगे और अगले दिन से अधिक मास शुरू हो जाएगा, जो 16 अक्टूबर तक चलेगा।
17 अक्टूबर से नवरात्रि शुरू होगी  

पं. शास्त्री के अनुसार इस तरह श्राद्ध और नवरात्रि के बीच इस साल एक महीने का समय रहेगा। दशहरा 26 अक्टूबर को और दीपावली 14 नवंबर को मनाई जाएगी। 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी रहेगी और इस दिन चातुर्मास खत्म हो जाएगा। लीप ईयर और अधिक मास एक ही साल में : ज्योतिषाचार्य शास्त्री के अनुसार 19 वर्ष पूर्व 2001 में आश्विन माह का अधिक मास आया था। अंग्रेजी कैलेंडर का लीप ईयर और आश्विन के अधिक मास का योग 160 साल बाद बन रहा है। इससे पहले 1860 में ऐसा अधिक मास आया था। जब उसी साल लीप ईयर भी था। हर तीन साल में आता है अधिक मास : डाॅ. शास्त्री ने बताया कि एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है। जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर रहता है। ये अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है, जिसे अधिक मास कहते हैं। अधिकमास को क्यों कहा जाता है मलमास : अधिक मास में सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। इस पूरे माह में सूर्य संक्राति नहीं रहती है, इस वजह से ये माह मलिन हो जाता है। इसलिए इसे मलमास कहते हैं। मलमास में नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी जैसे शुभ कर्म नहीं किए जाते हैं।

चातुर्मास में तप और ध्यान करने का है विशेष महत्व
चार्तुमास में संत एक ही स्थान पर रुककर तप और ध्यान करते हैं। यात्रा करने से बचते हैं, क्योंकि ये वर्षा ऋतु का समय रहता है। मान्यता है कि इस समय में विहार करने से छोटे-छोटे कीटों को नुकसान होने की अाशंका रहती है। धर्म ग्रंथों मे चातुर्मास में भगवान विष्णु विश्राम करते हैं और सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं।

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