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आर्ट ऑन क्लिक:आदिवासी गीत हीड, इस बार काेराेना से बचाव के लिए गाया

मांडूएक महीने पहले
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  • 21 दिन तक अलग-अलग जिलों में 7 कलाकर देंगे प्रस्तुति, रोज 40 आदिवासी परिवार तक पहुंचेंगे
  • मांडू के कनडीपुरा से ऑनलाइन प्रसारणा के बाद हुई प्रदेश में शुरुआत

सुख-समृद्धि की कामना के लिए दिवाली की रात में गाया जाने वाले आदिवासी लाेकगीत हीड का ऑनलाइन प्रसारण किया गया। पहली शुरुआत मांडू के गांव कनड़ीपुरा से हुई। इस बार यह गीत दिवाली के पहले काेराेना महामारी से सभी की रक्षा और इस बीमारी से मुक्ति के लिए आदिवासी गायक कलाकाराें द्वारा गाया गया।

लकड़ी में घुंघरू बांधकर आदिवासी पाैशाख में प्रसिद्ध लाेक गायक मदन भाबर और 7 साथी कालाकाराें ने इसकी प्रस्तुत दी। 30 मजराें-टाेलाें में शाम 5 से सुबह 5 बजे तक हीड गाया गया। इसे आर्ट ऑन क्लिक नाम दिया गया। धनतेरस से लक्षमीपूजन तक हाेता है विशेष महत्व : आदिवासी लोक संस्कृति में हीड लोकगीत का विशेष महत्व माना जाता है। यह अक्सर कार्तिक महीने में दिवाली के 3 दिन पहले धनतेरस से लेकर लक्ष्मी पूजन तक गाया जाता है।

गणेश वंदना से की शुरुआत : हीड गीत की शुरुआत गणेश वंदना से की गई है। इसके बोल पहले भावाणा देवी शारदा जैकी पाछे गणपत मनावा वंदना के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इसके बाद हीड बोली के प्रसिद्ध गीत सूती काय जागे मारी बेनकी थारा राय आंगन हेड़िया उबा, और बाजार करने जालियों भालो गुजरो यो तो बाजार करने चालियो भी गाया गया।

समाज के लिए औषधि का काम करता है हीड-भाबर

प्रसिद्ध हीड गायक मदन भाबर ने बताया यह गीत एक प्रकार से औषधि का काम करता है। काेराेना संक्रमण रुक नहीं रहा है। हमारा मानना है कि हीड के माध्यम से हम अपने सभी भाइयाें काे बचाने में सफल हाेंगे। इसीलिए इसका ऑनलाइन आयाेजन किया जा रहा है। रविवार काे धार जिले के मांडू के गांव कनमड़ीपुरा से इसकी शुरुआत की गई। 21 दिन तक प्रतिदिन प्रदेश के एक-एक जिले से इसकी प्रस्तुति दी जाएगी।

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