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धार में होली पर गल-चूल मेला:40 डिग्री तापमान में गोद में बच्चा लिए 12 फीट तक अंगारों पर चलीं आदिवासी महिलाएं, बांस की लकड़ी पर हवा में घूमे पुरुष

धार3 महीने पहले
धार में सगवाल गांव में मन्नत पूरी होने के बाद चूल परंपरा निभाने के लिए महिलाएं बच्चे को गाे में लेकर जलते अंगारों पर चलीं।
  • धार जिले के सगवाल में करीब 200 वर्ष पुरानी परंपरा आज भी जीवित है
  • 30 किमी तक पैदल चलकर आते हैं मन्नतधारी

जिले के अमझेरा के समीप सगवाल गांव में होली के दूसरे दिन सोमवार दोपहर 12 बजे धुलेंडी पर्व पर आस्था और मन्नत की अनूठी परंपरा निभाई गई। 40 डिग्री तापमान के बीच चिलचिलाती धूप में 12 फीट जलते अंगारों पर महिलाएं चलीं। 30 किमी दूर से पैदल चलकर आए युवा और वृद्ध पुरुषों ने 500 फीट ऊंचाई पर पहुंचकर बांस बंधी लकड़ी के सहारे हवा में घूमकर अनूठी परंपरा में शामिल हुए।

जलते अंगारों पर चलने वाली प्रथा को चूल चलना कहते हैं। आसमान में 500 फीट ऊंचाई पर बांस की लकड़ी पर घूमने वाले रिवाज को गल कहते हैं। सगवाल गांव में यह परंपरा पिछले 200 वर्ष पहले से मनाई जा रही है। हर वर्ष यहां गल और चूल का खण्डेराव मेला होता है। इस बार कोविड के चलते प्रशासन द्वारा सिर्फ आस्था का पर्व मनाने की अनुमति दी गई। मेला निरस्त करते हुए सिर्फ गल और चूल प्रथा मनाई गई।

अंगारों पर जब आस्था चली, तो इसे देख हर कोई हैरान रह गया। 12 फीट तक जलते अंगारों पर चलने के बाद भी मन्नत धारी महिलाओं के पैरों में छाले पड़ना, तो दूर की बात निशान तक नहीं दिखा। 30 किमी तक पैदल चलकर आए युवकों को 500 फीट ऊंचे गल पर चढ़कर हवा मे बिना सहारे के घूमना यह भी किसी आश्चर्य से कम नहीं। ग्राम पंचायत सहायक सचिव मनीष परमार ने बताया कि इस परंपरा का आयोजन दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक चलता रहा। दोपहर 1 बजे तक 60 से अधिक महिला जलते अंगारों पर चलीं, वहीं 100 से अधिक पुरुष गल मे शामिल हुए।

गल की परंपरा में शामिल युवा
गल की परंपरा में शामिल युवा

गांव के महेश पाटीदार कहते हैं कि जिले के 50 से अधिक गांव के मन्नतधारी महिला और पुरुष बड़ी सख्यां में शामिल होकर वर्षों पुरानी रीति रिवाज के साथ मन्नत चूल पर चढ़कर और गल में घूमकर पूरी करते हैं। अब तक इस परंपरा निभाने में बड़ी घटना भी नही हुई है। 30 किमी तक पैदल चलकर यहां आने वाले मन्नत धारी अपनी मन्नत पूरी कर अपने निजी वाहन से वापस लौटते हैं। कई महिलाएं अपने बच्चे को गोद मे उठाकर जलते अंगारोंं पर चलती हैं, यह मन्नत पूर्व में ली जाती है।

इनपुट- गोपाल खण्डेलवाल, अमझेरा

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