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श्राद्ध:सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या आज, घरों में होगा तर्पण

झाबुआ10 दिन पहले
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  • घरों में तर्पण करने के बाद कुशाओं का विसर्जन कुआं, बावड़ी आदि जलाशयों में कर सकते हैं

सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या 17 सितंबर को है। पंडितों के अनुसार अमावस्या की तिथि बुधवार से हो गई लेकिन अंतिम श्राद्ध 17 सितंबर को ही किया जाएगा। इसके साथ ही पितृपक्ष का समापन हो जाएगा। कोविड-19 के चलते इस बार घाटों पर तर्पण नहीं होगा। लोग घर पर ही पितरों को विदाई देंगे। पंडित ऑनलाइन तर्पण भी कराएंगे। पं. हिमांशु शुक्ल ने बताया घरों में तर्पण करने के बाद कुशाओं का विसर्जन नजदीकी कुआं, बावड़ी आदि जलाशयों में कर सकते हैं।

शुक्ल के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु अमावस्या को हुई हो। वहीं जिन लोगों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती है उन लोगों का श्राद्ध तर्पण और पिंडदान भी सर्वपितृ अमावस्या को किया जाता है। इसलिए सर्वपितृ अमावस्या को बहुत ही विशेष माना गया है। शुक्ल ने बताया सर्वपितृ अमावस्या को किसी का भी श्राद्ध किया जा सकता है।

यदि पितृपक्ष में किसी कारण से श्राद्ध नहीं कर पाए हैं तो वे लोग भी इस दिन पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं। इस दिन विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करने से पितर प्रसन्न होते हैं और अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं। सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी भूले बिसरे पितरों के निमित्त तर्पण किया जा सकता है। पितृपक्ष का अंतिम दिन होने के कारण इस दिन पितरों को बहुत ही आदर भाव से विदा करना चाहिए।

पितरों से क्षमा याचना करें, दीपक भी जलाएं
पंडित शुक्ल ने बताया सर्वपितृ अमावस्या को पितरों से क्षमा याचना करते हुए उन्हें विदा करना चाहिए। पितरों का स्मरण करते हुए जाने अनजाने में किसी भी प्रकार की गलती के लिए क्षमा मांगे और परिवार के सभी सदस्यों पर आशीर्वाद बनाए रखने की प्रार्थना करें।

तीन पीढ़ियों तक का नाम लेकर तर्पण कर सकते हैं
पं. विश्वनाथ शुक्ल ने बताया सर्वपितृ अमावस्या पर सभी पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए तर्पण के अंतर्गत जल, तिल, दूध, जौ इत्यादि का उपयोग कर कुशा के द्वारा पितरों के निमित्त जल दिया जाता है। जिसे तर्पण कहते हैं। इस तर्पण में जो परिवार में सदस्य नहीं है।

उनका तीन पीढ़ियों तक का नाम लेकर तर्पण किया जाता है। माता-पिता, दादा-दादी, परदादा-परदादी, नाना-नानी, परनाना-परनानी। इसके अतिरिक्त तर्पण करने वाले व्यक्ति के अन्य रिश्तों में जैसे बुआ, मासी, काका, मित्र, गुरु इत्यादि के लिए भी तर्पण का विधान है। तर्पण के पश्चात शालिगराम पूजा का विधान है। इसके बाद वैश्वदेव अग्नी के साथ पंचग्रास बलि-गाय, श्वान, कौआ, कीट-पतंग व चीटियों के लिए पांच भाग भोजन का दिया जाता है। जिसे पंचग्रास बलि कहते हैं। इसके साथ तर्पण की क्रिया पूर्ण होती है।

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