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गुजरात बॉर्डर के पास:बसों का अवैध अड्‌डा, सवारी बुक करते हैं एजेंट, बाॅर्डर पर लग जाती है गुजरात की बसें

झाबुआ / पिटोल2 महीने पहले
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  • प्रदेश में बसाें के आने पर बनता है अलग पास, ये नहीं होने से एमपी में नहीं मिलती है एंट्री

इन दिनों बड़ी संख्या में मजदूर वर्ग काम के लिए गुजरात जा रहा है। गुजरात जाने वाली बसों में खासी भीड़ है। हाल ये हैं कि परमिट वाली जितनी बसें हैं, वो कम पड़ रही है। ऐसे में गुजरात परिवहन वालों ने इसमें कमाई का जरिया ढूंढ लिया।

मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच रेसिप्रोकल एग्रीमेंट (परस्पर यातायात करार) में जो बसें शामिल नहीं हैं, वो एमपी में इंट्री नहीं कर सकती। ऐसे में गुजरात स्टेट ट्रांसपोर्ट की कुछ बसें हर दिन पिटोल से आगे बॉर्डर पर आकर खड़ी हो जाती हैं। सवारियां लेकर गुजरात में अलग-अलग जगह जाती हैं।

बसों के संचालन का ये सिस्टम प्राइवेट ऑपरेटर्स की तरह चलता है। पिटोल और झाबुआ में कुछ एजेंट सवारियाें की बुकिंग करते हैं। हर दिन की बुकिंग के हिसाब से बसें बुलवा ली जाती हैं। गुजरात एसटी वाले हर शाम 5 से 6 बजे के बीच बसें बाॅर्डर पर लाकर खड़ी कर देते हैं।

आदिवासी मजदूर अपने साधनों से या दूसरी बसों से यहां तक पहुंचते हैं। सामान एक गाड़ी से दूसरी गाड़ी पर लादकर इन बसों से अपनी काम वाली जगह पर पहुंच जाते हैं। बताया जाता है, ऐसा ही गुजरात से लौटने वालों के लिए होता है। ये धंधा इसलिए भी मुनाफे वाला साबित हो रहा है, क्योंकि ज्यादातर ट्रेनें अभी बंद हैं। राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में किसान आंदोलन के कारण अभी ना के बराबर ट्रेनें पहुंच रही हैं।

मजदूरों के लिए बॉर्डर तक पहुंचना महंगा

ग्रामीणों और मजदूर वर्ग के लिए इन बसों तक 3 किमी बॉर्डर पर पहुंचना महंगा पड़ रहा है। जीप वाले और दूसरे साधन वाले हर सवारी से 50 रुपए तक ले लेते हैं। इसके बाद बस से गंतव्य तक 250 से 400 रुपए में पहुंच जाते हैं। लेकिन सामान उठाकर 3 किलोमीटर पैदल चल पाना उनके लिए संभव नहीं है।

नई दुकानें लग गई : जहां ये बसें खड़ी होती हें, वहां हर दिन भीड़ सैकड़ों की संख्या में जमा हो रही है। हाल ये हैं कि कुछ दिन पहले तक यहां 3 नाश्ते-चाय की दुकानें थी। अब 10 के आसपास हो गई। शाम को यहां का नजारा किसी व्यस्त बस अड्‌डे की तरह का दिखता है।

जनवरी में हुई थी एक बस पर कार्रवाई : ऐसी ही एक बस पर जनवरी महीने में आरटीओ ने कार्रवाई की थी। ये बस हर दिन पिटोल आकर सवारियां सूरत ले जाती थी। आरटीओ ने एक दिन पहुंचकर दस्तावेज मांगे तो वो नहीं थे। आरटीओ ने बस बंद कराई और 92,500 रुपए जुर्माना लगाया था।

इसलिए नहीं आ पाती बसें

मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच पारस्परिक यातायात करार है। इसमें बसों को स्टेट में आने के लिए अनुमति लेना होती है। जिनके पास है, वो आ सकते हैं, लेकिन जिनके पास नहीं है उन्हें बिना परमिट की बस माना जाता है। कई बार इस तरह की बसों ने इस तरफ आने की कोशिश की, लेकिन उन्हें रोक दिया गया।

भोपाल जानकारी देंगे

अगर बसें रेसिप्रोकल एग्रीमेंट से बाहर हैं तो वो बिना परमिट के रूप में मानी जाती हैं। इन बसों की जानकारी वरिष्ठ कार्यालय को देंगे। हमारे स्तर पर जो कार्रवाई कर सकते हैं, करेंगे।

-राजेश कुमार गुप्ता, आरटीओ, झाबुआ

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