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भास्कर Insight:2017 में कपड़े पर 5% जीएसटी, अब कारोबारी के रिफंड रोकने के लिए लगा रहे 12% टैक्स

इंदौरएक महीने पहले
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4 साल 5 महीने में इस सेक्टर में तीसरी बार फेरबदल। - Dainik Bhaskar
4 साल 5 महीने में इस सेक्टर में तीसरी बार फेरबदल।

देश की जीडीपी में दो फीसदी का योगदान देने वाले और खेती के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले सेक्टर कपड़ा बाजार में जीएसटी की स्लैब 5 से बढ़ाकर 12 फीसदी करने को लेकर कारोबारियों में जमकर नाराजगी है। कपड़े में सबसे ज्यादा रोजगार को देखते हुए जीएसटी लाने से पहले इस पर कभी भी बड़े पैमाने पर टैक्स (साल 2003-04 में सीमित रूप से एक्साइज ड्यूटी लगी थी) नहीं था। जुलाई 2017 में जीएसटी आने के बाद इस सेक्टर में यह तीसरा फेरबदल है।

पहला फेरबदल

1 जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होते समय कपड़े को पूरी तरह से टैक्स के दायरे में लाया गया। कारोबारियों ने जीएसटी मुक्त करने या फिर जीरो टैक्स की मांग रखी, लेकिन जीएसटी काउंसिल ने 5 फीसदी जीएसटी लगाया और तर्क दिया कि कच्चे माल व अन्य कई वस्तुओं पर टैक्स है, ऐसे में यदि इसकी क्रेडिट मैन्युुफैक्चर्स को नहीं मिली तो इस टैक्स को वह कपड़े की लागत में जोड़ेंगे। इससे लागत बढ़ेगी और कपड़ा और ज्यादा महंगा होगा। इस बात को कारोबारियों ने मान लिया।

दूसरा फेरबदल

जीएसटी में कारोबारी की क्रेडिट अधिक जमा होती है तो उसे रिफंड का अधिकार होता है, लेकिन पांच फीसदी जीएसटी लगाते समय जीएसटी काउंसिल ने प्रावधान किया है कि वह कारोबारी को रिफंड नहीं देंगे, वह अपनी क्रेडिट इसी में समायोजित करें। जब कारोबारियों के पास भारी मात्रा में क्रेडिट जमा होने लगी तो उन्होंने रिफंड की मांग की, आखिरकर अगस्त 2018 में जीएसटी काउंसिल ने जमा क्रेडिट पर एक फॉर्मूला बनाकर रिफंड का प्रावधान कर दिया।

तीसरा फेरबदल

रिफंड का फॉर्मूला कठिन था, लेकिन इसके बाद भी नंबर एक में कारोबार करने वाले बड़े उत्पादकों को बड़ी मात्रा में रिफंड जाने लगा। बीच-बीच में इस फॉर्मूले की जटिलता को लेकर भी विरोध होता रहा। जीएसटी काउंसिल ने अधिक रिफंड की बात तो नहीं की, लेकिन यह कहा कि कारोबारियों को फॉर्मूले के कारण व अन्य तकनीकी वजहों से रिफंड में समस्या आ रही है, इसलिए अब टैक्स बढ़ाकर 12 फीसदी कर देते हैं। इससे इनपुट टैक्स और आउटपुट उत्पाद पर टैक्स बराबर होने से क्रेडिट जमा नहीं होगी और रिफंड की समस्या खत्म हो जाएगी और लागत भी समायोजित हो जाएगी।

अधिक दर वालों को 5% में लाते तो किसी पर बोझ नहीं आता

जीएसटी विशेषज्ञ व सीए सुनील पी. जैन बताते हैं अधिकांश कच्चे माल पर पांच फीसदी टैक्स है। कुछ पर ही 12 और बहुत कम पर 18 फीसदी टैक्स है। ऐसे में कपड़े पर 12 फीसदी जीएसटी लाने की जगह यदि सरकार अधिक दर वालों को 5 फीसदी में ला देती है तो इनपुट और आउटवर्ड उत्पाद दोनों की टैक्स जिम्मेदारी बराबर हो जाती और किसी पर बोझ नहीं आता। कपड़े की लागत भी नहीं बढ़ती। लेकिन दर बढ़ाने से कपड़ा महंगा होगा।

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