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कोरोना वॉरियर:64% इन्फेक्शन, अस्पताल में इंजेक्शन नहीं तो कभी ऑक्सीजन खत्म, परिवार की खातिर हौसला बनाए रखा, आखिर सब जीते

इंदौर6 महीने पहलेलेखक: शौनिक शर्मा
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कोरोना से जीतकर शर्मा परिवार अब 
पूरी तरह स्वस्थ है। - Dainik Bhaskar
कोरोना से जीतकर शर्मा परिवार अब पूरी तरह स्वस्थ है।

पिछले एक महीने जो परेशानी सामने आई और जो संघर्ष किया, उसे मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। माता-पिता, पत्नी, दोनों बच्चे और फिर मैं खुद कोरोना पॉजिटिव हुआ। जीवन का सबसे कठिन दौर। एक के बाद एक सदस्य होम आइसोलेशन में। संक्रमण ज्यादा फैलने से मुझे हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा। वहां जो दृश्य देखा, रोंगटे खड़े हो उठे। लेकिन इन सभी के बाद भी एक बात जो मुझे याद रही, वह थी- धैर्य, हौसला और हिम्मत रखें। सब कुछ ठीक होगा, हुआ भी वही। एक महीने के बाद सुखद बात यह कि अब हम सभी सदस्य एक साथ हैं। सब ठीक हैं। मैं भी दो दिन पहले डिस्चार्ज होकर तिलक नगर स्थित घर आ गया।

एक महीने पहले मेरी पत्नी अनामिका की तबीयत बिगड़ी। उन्हें खुशबू आना बंद हो गई। हमने तुरंत अलग कमरे में शिफ्ट किया। अगले दिन रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई। घर की जिम्मेदारी मां ने संभाली। दो दिन बाद पिताजी को बुखार आया। वे भी कोरोना पॉजिटिव हो गए। उसके दो-तीन दिन बाद दोनों बच्चे भी। होम आइसोलेट के बीच सब कुछ ठीक चल रहा था कि 9 अप्रैल को मेरी तबीयत बिगड़ना शुरू हुई। मुझे बुखार आ गया।

मैंने जांच करवाई तो इन्फेक्शन आया। एक समय ऐसा आया कि ऑक्सीजन लेवल 85 फीसदी तक आ गया था। लंग्स इन्फेक्शन करीब 64 फीसदी तक पहुंच गया था। यहां से शुरू हुआ अस्पताल का संघर्ष। भर्ती होने के लिए हॉस्पिटल में बात की तो कहीं पर भी बेड खाली नहीं मिले। जैसे-तैसे एक निजी अस्पताल में बेड मिला। वहां ऑक्सीजन नहीं थी। हम सिलेंडर साथ लेकर गए। इलाज ठीक से नहीं होने पर दूसरे अस्पताल में भर्ती हुए। वहां हॉस्पिटल में रेमडेसिविर के लिए परिजन सुबह से लंबी कतार में लगे। परिवार के लोगों ने बताया कि 150 से ज्यादा लोग लाइन में लगे थे।

आठ घंटे की मशक्कत के बाद एक इंजेक्शन मिला। अगले दिन सुबह से वहां ऑक्सीजन खत्म। दोपहर तक इंतजार किया। इस बीच आठ घंटे जैसे-तैसे बीते। फिर एक दोस्त की मदद से सरकारी हॉस्पिटल में शिफ्ट हुए। हॉस्पिटल का मंजर देख मुझे भी डर सा लगा। चारों ओर अकेले मरीज। हर कोई वहां जिंदगी से संघर्ष करता नजर आया। इनमें मैं भी एक था। आईसीयू के बेड पर मैं एक ही बात सोच रहा था कि मुझे परिवार के लिए वापस जाना है।

बहन, दोस्त और ससुराल पक्ष के लोगों ने इस दौर में खूब मदद की। जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत भी थी। मैंने भी धैर्य और हिम्मत रखी। आखिरकार सब कुछ ठीक हुआ। 10 दिन के बाद अब हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हुआ। घर पहुंचा। सब खुशियां पहले जैसी। इन सभी संघर्ष के बाद एक बात और सीखी ‘अंत भला तो सब भला’। मुझे मेरा परिवार मिल गया। यही सच्ची खुशी भी है। मैं परिवार से लेकर दोस्त, डॉक्टर, नर्स, स्टाफ सहित सभी लोगों को धन्यवाद देता हूं। वहीं, जो लोग कोरोना पॉजिटिव हैं, उनके लिए एक बात कहूंगा कि यह समय धैर्य और हिम्मत रखने का है। बुरा वक्त बहुत जल्द बीत जाएगा। कोरोना हारेगा, हम जीतेंगे।

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