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सीएम के निर्देश पर बदली व्यवस्था:एक हफ्ते बाद मरीज बढ़े तो 3 माह बाद फिर बैरिकेडिंग शुरू की, 3 मरीज कोविड सेंटर भेजे

इंदौर4 महीने पहले
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फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
फाइल फोटो

शहर में एक सप्ताह बाद फिर सात कोरोना पॉजिटिव मिलने के बाद व्यवस्था में बदलाव किया गया। करीब तीन महीने बाद किसी पॉजिटिव मरीज के घर के बाहर बैरिकेडिंग की गई और लगभग डेढ़ महीने बाद तीन मरीज कोविड केयर सेंटर भेजे गए। मरीजों में बढ़ोतरी को लेकर गुरुवार सुबह करीब 11 बजे मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर प्रशासन को सतर्क करने के साथ लोगों से सजग रहने का अनुरोध किया था।

इसके बाद प्रशासन ने मरीजों की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की तथा बीते चार दिनों में मिले सभी लोगों व उनके आसपास के घरों की सैंपलिंग और बैरिकेडिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी। कलेक्टर मनीष सिंह ने कहा कि बीते चार दिनों का पूरा रिकॉर्ड देखा जा रहा है कि कहां से मरीज आ रहे हैं और कहां से संक्रमित हुए। बुधवार को मिले मरीजों में ज्यादातर युवा हैं। इनमें 61 वर्षीय एक डॉक्टर जरूर शामिल हैं। सात मरीजों में से केवल एक को ही अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ी है। हालांकि गुरुवार को दो ही मरीज मिले।

कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग में लगी टीम भी हैरत में पड़ी; इक्का-दुक्का मरीज कैसे संक्रमित हो रहे

  • पांच मरीजों में से एक महिला गृहिणी है, वहीं एक पुरुष मार्केटिंग का काम करता है। एक की दुकान है। दो की निजी नौकरी है।
  • किसी की ट्रेवल हिस्ट्री नहीं है। यानी इंदौर से बाहर नहीं गए। यहीं काम करते हैं और बाजार गए थे। संपर्क में भी कोई पॉजिटिव नहीं था, सभी ने कहा कि उन्हें नहीं पता कैसे पॉजिटिव हुए।
  • 2 मरीज पहले भी पॉजिटिव हो चुके। 2 महिलाएं वैक्सीनेटेड हैं, इसमें एक को पहला और दूसरी को दोनों डोज लग चुके हैं। ऐसे ही डॉक्टर मरीज को भी दोनों डोज लग चुके हैं।
  • महू की महिला का कहना था कि वह मंगलवार को राशन लेने गई थी। वहां सैंपल लिया तो पॉजिटिव आई। उसे वैक्सीन का एक डोज भी लग चुका है। कोविड केयर सेंटर में शिफ्ट किया है।
  • 61 वर्षीय डॉक्टर 4-5 दिन पहले जुकाम और बुखार के चलते अरबिंदो अस्पताल में भर्ती हुए। वैक्सीन के दोनों डोज लगने के बाद भी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। हाल ही एंटीबॉडी जांच करवाई तो उसका स्तर 1300 है।
  • मारुति नगर निवासी मरीज के नाम के साथ जो नंबर दर्ज किया, वह गलत निकला। सुबह से निगम और स्वास्थ्य अधिकारी फोन करते रहे और वह यही कहता रहा कि मैंने सैंपल दिया ही नहीं है। कर्मचारी वास्तविक मरीज के बारे में पता लगाने में लगे रहे।