अनूप जलोटा बोले- मैं संत नहीं, शराब भी पीता हूं:भजन गायक भी साधारण इंसान, अरे मुझे भी मस्ती करने दो यार

इंदौर6 महीने पहलेलेखक: अंकिता जोशी

पद्मश्री अनूप जलोटा का मानना है कि भजन गायक भी एक कलाकार है। उसे संत न माना जाए। लोग ऐसा क्यों चाहते हैं कि भजन गायक साइकिल पर ही घूमे और मर्सिडीज न चलाए। भजन गाकर कोई गलती कर दी क्या उसने? उसे भी जिंदगी के सब मजे करने का अधिकार है। एक कार्यक्रम में प्रस्तुति देने आए अनूप जलोटा ने दैनिक भास्कर से कई मुद्दों पर खुलकर बात की। पढ़िए उनसे सीधी बात...

सवाल- भजनों के लिए लाउडस्पीकर लगाए जाते हैं। फिर अजान पर विवाद क्यों हुआ?
अनूप जलोटा- अजान हो या हनुमान चालीसा... वो पढ़ी-सुनी जानी चाहिए, लेकिन उसका वॉल्यूम उतना हो जिससे किसी को असुविधा न हो। मैंने तो दास्तान-ए-कर्बला भी गाया है। बिस्मिल्ला खां साहब जैसे दिग्गज ने अजान रिकॉर्ड की है और बड़ी अद्भुत गायी है। अजान में सुर है। हनुमान चालीसा में लय है। ये ईश्वर को पुकारने, उन्हें याद करने, उनका आशीर्वाद पाने का तरीका है और यह तरीका मधुर ही होना चाहिए। इसमें चीखने का क्या काम। हम भजन गाते हैं तो समय सीमा तक गाते हैं। रात 10.30 बजे कार्यक्रम खत्म कर देते हैं।

सवाल- कहा जाता रहा है कि भाजपा भगवावाद के बूते ही जीवित है। क्या वजह लगती है? अनूप जलोटा- भारतीय जनता पार्टी को अब मुद्दों की आवश्यकता नहीं है। अब पार्टी काम करती है। पहले सरकारी रुपया जरूरतमंदों तक पहुंच नहीं पाता था। आज सबका अकाउंट है, जिसमें सीधे पैसा पहुंचता है। मोदी और योगी की जोड़ी राम-लक्ष्मण की जोड़ी जैसी है। अच्छी योजनाएं बनाईं और करके दिखाया। उन्होंने देश को इस स्थिति में पहुंचा दिया है कि सारा संसार आपकी ओर देख रहा है।

सवाल- चर्चा है कि फिल्म द कश्मीर फाइल्स भी अलग मंसूबे से बनवाई गई है। आपका क्या मानते हैं? अनूप जलोटा- यह सरासर गलत है कि यह फिल्म सरकार ने बनवाई है। हां, यह जरूर है कि इसे देखने के बाद जो हवा बनी, उसके बाद सरकार और मेरी तरह कई लोग चाहते हैं कि देश का हर नागरिक यह फिल्म देखे। सच्चाई क्यों न देखी और दिखाई जाए। यह तो प्रोड्यूसर-डायरेक्टर का फैसला था, सरकार का नहीं।

सवाल- मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में सांप्रदायिक फसाद हुए। हम इन घटनाओं से उबर गए थे। दोबारा वहां क्यों पहुंच गए हैं?
अनूप जलोटा- ऐसा लगता है कि कोई एक समूह है जो अवाम को उकसा रहा है। इसमें किसी भी जाति के लोग हो सकते हैं, लेकिन उनका एजेंडा लोगों को लड़वाकर अपने हित पूरे करना है। उनकी फंडिंग भी की जा रही है। कोई व्यक्ति अपने छत पर पत्थर जुटाकर क्यों रखेगा। उसे कुछ तो मिल रहा होगा। फसाद की जड़ यही लोग हैं।

सवाल- पद्मश्री से सम्मानित हैं आप। क्या वजह रही कि आप बिग बॉस में गए? अनूप जलोटा- मैंने बिग बॉस शो कभी देखा नहीं था। मैंने शो से बाहर आने के बाद भी बिग बॉस नहीं देखा। मैं उस शो में गया था एक पेड हॉलिडे के लिए। डेढ़ महीने की छुट्‌टी अगर मैं स्विट्जरलैंड में जाकर बिताता तो पांच-सात लाख रुपए खर्च हो जाते। मुझे उससे कहीं ज्यादा पैसे बिग बॉस ने दिए और छुट्‌टी भी मिल गई। मैंने उस शो में कोई अश्लील काम नहीं किया। जसलीन का हाथ भी नहीं पकड़ा मैंने। एक ड्रीम सीक्वेंस उन्होंने हमारे लिए बनाई थी और वह हिस्सा स्क्रिप्टेड था। जैसा करने के लिए कहा गया, हमने किया। हुआ यूं था कि जसलीन जो मुझसे गाना सीखती थी, मेरे पास आई और बोली कि मेरे साथ चलिए मुझे इस शो में बुलाया गया है। ऑड कपल को जाना है। मैंने कहा ठीक है, तुम मेरी शिष्या बनकर चलो। उसने शो में कह दिया कि मेरा तो इनसे तीन साल से अफेयर चल रहा है। मैंने पूछा कि तुमने यह क्यों कहा। उसने कहा किसी कॉन्ट्रोवर्सी के बिना अटेंशन नहीं मिलता। फिर मैं राजी हो गया। मैं जब शो के बाहर आया तो मां ने मुझसे पूछा कि ये जसलीन कौन है। तब मुझे पता लगा कि बाहर तो बड़ा बवाल हो गया है। लोग इसी टॉपिक पर बात कर रहे हैं और यह राष्ट्रीय मुद्दा बना हुआ है। फिर मैंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और कहा कि मैं और जसलीन के पिता मिलकर उसका कन्यादान करेंगे। अब इससे ज्यादा और क्या स्पष्टीकरण दूं।

सवाल- इस शो से पहले आपकी छवि बेदाग थी। आपको नहीं लगता था कि जबरन में छवि खराब हुई?
अनूप जलोटा- मैं भजन गायक हूं। संत नहीं। मैं मर्सिडीज क्यों नहीं चला सकता। उसके लिए ऐसी सोच क्यों रख रहे हैं कि वह वैराग्य लेकर हिमालय पर चला जाए। भजन गायक होने की सजा क्यों दे रहे हैं मुझे। मुझे भी मजे करने दो। क्या भजन गायक होकर मैंने गलती कर दी। भजन प्रस्तुति के बाद मैं शराब भी पीता हूं। जो पसंद है वह खाता हूं। कहां लिखा है कि भजन गायक यह सब मजे नहीं कर सकता।

सवाल- यूथ और सोशल मीडिया के बारे में क्या कहेंगे? अनूप जलोटा- सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपने न्यूज पेपर का एडिटर बना दिया। कुछ भी लिख रहे हैं। गालियां तक सरेआम लिख रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन थोड़ा नियंत्रण तो जरूरी है। वरना संस्कृति दूषित होगी।