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भास्कर पड़ताल:इंदौर: देश में कोरोना से मर रहे, उधर 300 करोड़ के लालच में सरकार बंद नहीं करवा रही शराब दुकानें

इंदौर5 महीने पहले
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प्रतीकात्मक फोटो
  • लाइसेंस फीस में छूट ना देना पड़े इसलिए रोज खुलवा रहे शराब दुकान
  • कर्फ्यू वाले जिलों को छोड़ अभी भी ठेकेदार मजबूरन खोल रहे दुकान

इंदौर (सुनील सिंह बघेल). इधर कोरोना संक्रमण तेजी से थर्ड स्टेज की ओर बढ़ रहा है फिर भी सरकार शराब दुकानों से राजस्व का लालच छोड़ नहीं पा रही है। लॉक डाउन के बाद इंदौर छिंदवाड़ा सहित कुछ जिलों को छोड़ , अधिकांश जिलों में अभी भी शराब दुकान मजबूरन खोली जा रही हैं। यह बात अलग है कि लोग इन दुकानों में पहुंच ही नहीं रहे। भास्कर ने पड़ताल की तो पता चला कि इसके पीछे ,लाइसेंस फीस से मिलने वाले 300 करोड़ के राजस्व का लालच है। 
राजस्व का यह लालच दुकान के कर्मचारियों और आम लोगों के लिए भी परेशानी का सबब बन सकता है। हर दुकान में 4 से 5 कर्मचारी काम करते हैं इन सब की सुरक्षा खतरे में हैं। यह संक्रमण के बड़े संवाहक भी बन सकते हैं।इंदौर ,छिंदवाड़ा जिलों के कलेक्टरों ने लॉक डाउन को देखते हुए 31 मार्च तक शराब की दुकानों को बंद रखने के आदेश दिए हैं।
भोपाल जबलपुर जैसे जिन जिलों में कर्फ्यू लागू है वहां की दुकानें बंद हैं लेकिन जहां सिर्फ लॉक डाउन है,कर्फ्यू नहीं हैं वहां दुकानें खोली जा रही हैं। मालवा क्षेत्र की ही बात करें तो यहां के धार, झाबुआ अलीराजपुर,बड़वानी, खंडवा जैसे जिलों में कर्फ्यू न होने के कारण ठेकेदारों को शराब दुकानें मजबूरन खोलना पड़ रही है। प्रमुख सचिव वाणिज्य ने भी इसको लेकर एक सर्कुलर जारी कर रखा है कि दोपहर 12:00 से शाम 5:00 तक दुकानें खोली जाएं। हालांकि इसे कलेक्टर के विवेक पर छोड़ा गया है।

सरकारी आदेश से दुकानें बंद होती हैं तो लाइसेंस देना पड़ेगी छूट
पिछले साल शराब की दुकानों के ठेके लगभग 9000 करोड़ रुपए में गए थे। सरकार यह लाइसेंस फीस 24 किस्तों में वसूलती है। 16 मार्च से 31 मार्च के फीस के रूप में सरकार को ठेकेदारों से लगभग 350 करोड रुपए लेना है। आपकारी नियमानुसार तीन प्रमुख फ्राइडे को छोड़ जिला कलेक्टर भी चार अवसरों पर ड्राई डे घोषित कर सकते हैं। इसके लिए ठेकेदारों को लाइसेंस फीस में कोई छूट नहीं दी जाती, लेकिन यदि इसके अलावा सरकारी आदेश से दुकानें बंद की जाती हैं तो राज्य सरकार को लाइसेंस फीस में छूट देना होगी। आखरी किसकी यह राशि 350 करोड़ रुपए के आसपास है। यही कारण है कि आबकारी विभाग चाहता है कि आधिकारिक रूप से दुकानें बंद ना की जाए। ठेकेदारों का कहना है कि सरकार को तत्काल निर्णय लेना चाहिए। थोड़े से राजस्व के लिए संक्रमण फैलने का खतरा नहीं उठाया जा सकता।

अधिनियम में शराब दुकानें बंद करवाना कलेक्टर का विवेकाधिकार
विनोद रघुवंशी, डिप्टी कमिश्नर एक्साइज इंदौर के मुताबिक, आबकारी अधिनियम में शराब दुकानें बंद करवाना कलेक्टर का विवेकाधिकार है। कुछ तय दिन के अलावा अगर दुकानें बंद रखी जाती हैं तो अधिनियम में शुल्क में छूट की व्यवस्था है।

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