इंदौर के हिंगोट युद्ध पर संशय:SDM की अपील- इस साल भी संयम रखें, MLA की चेतावनी- कहीं लोग सड़क पर न उतर आएं

इंदौर6 महीने पहले
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इंदौर के पास गौतमपुरा में धोक पढ़वा (गोवर्धन पूजा) पर होने वाले हिंगोट पर इस साल संशय है। SDM प्रतुल सिन्हा ने कहा है कि शहर में कोविड के मरीज मिल रहे हैं। पिछले 2 साल गौतमपुरा के लोगों ने जिस तरह से संयम रखा, यदि एक बार और संयम रख लें, तो शायद आने वाले साल तक हम इस महामारी से निजात पाने के बाद हिंगोट युद्ध को मना सकते हैं।

वहीं, प्रशासन के इस रुख पर कांग्रेस विधायक विशाल पटेल ने चेतावनी देते हुए कहा है कि परंपराओं पर प्रतिबंध न लगाएं। इस साल चुनाव और दूसरे आयोजनों के लिए प्रशासन छूट दे रहा है तो परंपरा भी निभाने दें। प्रशासन को कुछ सोचना चाहिए। ऐसा न हो कि जनता सड़क पर आ जाए।

युद्ध के दौरान दोनों दलों के योद्धा एक-दूसरे पर जलते हुए अग्निबाण (हिंगोट) से आक्रमण करते हैं। हमले में कुछ लोग घायल भी होते हैं। दीपावली के अगले दिन हर साल जांबाज तुर्रा और रुणजी के वीर कलंगी योद्धाओं के बीच होने वाले इस बेहद जोखिम भरे हिंगोट युद्ध पर तीसरे साल भी संशय है।

युद्ध में योद्धा एक-दूसरे पर जलते हिंगोट (अग्निबाण) फेंकते हैं। - फाइल
युद्ध में योद्धा एक-दूसरे पर जलते हिंगोट (अग्निबाण) फेंकते हैं। - फाइल

ऐसे होती है युद्ध की शुरुआत
दीपावली के अगले दिन पड़वा पर शाम 4 बजे तुर्रा-गौतमपुरा व कलंगी-रूणजी के निशान लिए दो दल यहां पहुंचते हैं। सजे-धजे ये योद्धा कंधों पर झोले में भरे हिंगोट (अग्निबाण), एक हाथ में ढाल व दूसरे में जलती बांस की कीमची लिए नजर आते हैं। योद्धा सबसे पहले बड़नगर रोड स्थित देवनारायण मंदिर के दर्शन करते हैं। इसके बाद मंदिर के सामने ही दर्शकों की सुरक्षा जालियों से घिरे मैदान में एक-दूसरे से करीब 200 फीट की दूरी पर दोनों दल आमने-सामने आ जाते हैं।

इसके बाद गौतमपुरा के तुर्रा दल द्वारा जलता हुआ हिंगोट रूणजी के कलंगी दल पर फेंकने के साथ ही इस युद्ध की शुरुआत हो जाती है। जैसे ही हवा में एक अग्निबाण चलता है, देखते ही देखते मैदान के दोनों छोर से योद्धा एक-दूसरे पर जलते हिंगोट फेंकना शुरू कर देते हैं। अंधेरा होने तक चलने वाले इस युद्ध में तुर्रा के योद्धा कलंगी के योद्धाओं से युद्ध करते हैं। युद्ध के दौरान जलता तीर लगने से कई लाेग घायल भी होते हैं, लेकिन इन सब के बीच उत्साह में कहीं कमी नहीं आती है। जैसे ही अंधेरा होता है युद्ध समाप्त कर दिया जाता है।

ऐसे बनता है हिंगोट

  • हिंगोट हिंगोरिया नाम के पेड़ पर पैदा होने वाला फल है। इसे दिवाली से एक महीने पहले लोग जंगल से तोड़ लाते हैं। नींबू के आकार का यह फल नारियल के समान कठोर और भीतर से खोखला होता है।
  • फल को ऊपर से साफ कर भीतर से उसका गूदा निकाल दिया जाता है। इसके बाद सूखने के लिए धूप में रख दिया जाता है। इसमें एक ओर बड़ा छेद कर उसे बारूद से भरकर पीली मिट्‌टी से मुंह बंद कर दिया जाता है।
  • हिंगोट के दूसरे छोर पर छोटा छेद कर बारूद की रंजक (बत्ती) लगा दी जाती है। इस तरह तैयार हुए हिंगोट पर 8 इंच लंबी बांस की कमची बांधी जाती है, ताकि निशाना सीधा लगे।
  • नवरात्र के पहले से ही यौद्धा इसे तैयार करने की तैयारी शुरू कर देते हैं। इस खेल के दौरान सुरक्षा के कई इंतजाम किए जाते हैं।

राजीव गांधी ने मालवा कला उत्सव में बुलवाया था
1984 में दिल्ली में हुए मालवा कला उत्सव में विशेष आमंत्रण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने तुर्रा व कलंगी दल के योद्धाओं ने इसका प्रदर्शन किया था। तब करीब 16 योद्धाओं को नगर के प्रकाश जैन दिल्ली ले गए थे। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में करीब एक घंटे इसका प्रदर्शन किया गया था। यह युद्ध कब से शुरू हुआ, इसका क्या इतिहास है, कोई नहीं जानता।

22 साल के युवक की मौत के बाद कोर्ट पहुंचा था मामला
2017 में हिंगोट युद्ध के खिलाफ एक दायर जनहित याचिका हाई कोर्ट में दायर की गई थी। अक्टूबर 2017 में गौतमपुरा में बड़नगर तहसील के ग्राम दातरवां का 22 साल का किशोर मालवीय दोस्तों के साथ हिंगोट युद्ध देखने पहुंचा था। वह दर्शक दीर्घा में बैठा था तभी एक हिंगोट उसके सिर पर लगा। इससे उसकी मौत हो गई थी। करीब सवा घंटे चले हिंगोट युद्ध में 38 लोग घायल हुए थे। मामले में कोर्ट ने प्रशासन से जवाब देने को कहा था।

सीमा की रक्षा के लिए जवान करते थे हमला
किंवदंती है कि रियासतकाल में गौतमपुरा क्षेत्र की सीमाओं की रक्षा के लिए तैनात जवान आक्रमणकारियों पर हिंगोट से हमले करते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार हिंगोट युद्ध एक किस्म के अभ्यास के रूप में शुरू हुआ था और उसके बाद इससे धार्मिक मान्यताएं जुड़ती चली गईं।