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ऐसे कैसे कोरोना मुक्त होगा शहर?:नाक से लिए सैंपल की जांच रिपोर्ट 65% सटीक, मगर इंदौर में एक महीने तक सिर्फ मुंह से ही स्वाब सैंपल लिया गया

इंदौर10 महीने पहलेलेखक: नीता सिसौदिया
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मुंह के रास्ते से लिए गए सैंपल के पॉजीटिव आने की संभावना 30 से 35 प्रतिशत मानी जाती है। - Dainik Bhaskar
मुंह के रास्ते से लिए गए सैंपल के पॉजीटिव आने की संभावना 30 से 35 प्रतिशत मानी जाती है।
  • कोरोना जांच के लिए दो सैंपल लेना थे, लेकिन एक माह तक एक ही सैंपल लिया गया
  • आईसीएमआर की गाइड लाइन के उलट सिर्फ एक ही स्वाब सैंपल जांच के लिए भेजा गया
  • अधिकारियों का कहना है -भोपाल से नहीं मिली किट, संभागायुक्त ने भी जताई नाराजगी

कोरोना संक्रमण की जांच के लिए किसी भी व्यक्ति के नाक (नेरोफेंजियल) और मुंह (ओरोफेंजियल) के रास्ते से दो तरह का स्वाब सैंपल लेना अनिवार्य है, लेकिन इंदौर में कई दिनों तक सिर्फ मुंह से एक ही सैंपल लिया गया। अब भी कई जगह पर सिर्फ एक ही सैंपल लिया जा रहा है, जबकि जानकारों का कहना है कि मुंह से लिए गए सैंपल के मुकाबले नाक से लिए गए सैंपल की काेरोना जांच के परिणाम ज्यादा सटीक होता है। रिपोर्ट के सही होने की संभावना 60 से 65 % मानी जाती है। 

इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की गाइडलाइन भी यही कहती है कि संदिग्ध मरीज के दोनों तरह के ही सैंपल लिए जाएं। इसके उलट इंदौर में स्वास्थ्य विभाग की टीम ने करीब एक माह तक सिर्फ ओरोफेंजियल यानी मुंह से एक ही सैंपल लिया। हाल ही में आईसीएमआर के इन नियमों के उल्लंघन को लेकर संभागायुक्त डॉ. पवन शर्मा ने भी कड़ी नाराजगी जताई। बावजूद कुछ फीवर क्लीनिक में अब भी एक ही सैंपल लिया जा रहा है। 

अभी भी ले रहा एक ही सैंपल
अभी भी कई जगह डॉक्टरों की टीम सिर्फ एक ही सैंपल ले रही है। इंदौर सहित संभाग के कई जिलों में सिर्फ मुंह से ही सैंपल लिया जा रहा था। गौरतलब है कि पिछले दिनों एमजीएम मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग ने जब एक सैंपल की बात कही तब संभागायुक्त ने सभी सीएमएचओ को चेताया कि ऐसी गलती नहीं करें। बावजूद अब भी ऐसा हो रहा है। 

निजी लैब में लिए जा रहे दो तरह के सैंपल
निजी क्षेत्र की लैब की बात करें तो यहां दो लैब हैं। घर या अस्पताल जाकर उनका स्टॉफ सैंपल लाता है। निजी लैब में दो तरह के सैंपल ही लिए जा रहे हैं। इन्हीं में से एक लैब की डायरेक्टर डॉ. विनीता कोठारी ने बताया कि संदिग्ध मरीज के दो प्रकार के सैंपल लिए जा रहे हैं। 

फीवर क्लीनिक पर 9 जुलाई को भी सिर्फ मुंह से लिया सैंपल
9 जुलाई को बाणगंगा के फीवर क्लीनिक पर संदिग्ध मरीज के सिर्फ एक ही सैंपल लिए गए। जबकि एक व्यक्ति के दोनाें तरह के सैंपल लेना जरूरी है। इसी तरह अन्नपूर्णा क्षेत्र में एक अस्पताल में कर्मचारी के पॉजिटिव आने के बाद आसपास के लोगों के सैंपल लिए गए, लेकिन वहां भी एक ही सैंपल लिया गया। वहीं, 13 जुलाई को भी कुछ जगह पर ऐसी ही स्थिति थी। 

मुंह से लिए सैंपल की रिपोर्ट 30 से 35 फीसदी ही सटीक
माइक्रोबायोलॉजिस्ट और आईएमए सचिव डॉ. साधना सोडानी ने बताया कि नेरोफेंजियल सैम्पल नेजल केविटी से लिया जाता है। ओरोफेंजियल सैंपल ओरल केविटी से लिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि नाक से यदि सैंपल लिया जाए तो पॉजिटिविटी की संभावना 60 से 65 प्रतिशत तक होती है। क्योंकि नाक में वायरस ज्यादा देर तक ठहरता है। इसलिए वहां से सैंपल लेना अनिवार्य है। मुंह के रास्ते से लिए गए सैंपल के पॉजीटिव आने की संभावना 30 से 35 प्रतिशत मानी जाती है। यदि दोनों ही जगह से एक साथ सैंपल लिया जाए तो वायरस की संख्या बढ़ जाती है और पॉजीटिव आने की संभावना बढ़ जाती है। 

भोपाल से किट नहीं मिल रहे थे
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. प्रवीण जडिया ने बताया कि भोपाल से किट नहीं मिल रहे थे, इसलिए एक ही सैंपल लिया जा रहा था। एक महीना यह समस्या आयी थी लेकिन दो सैंपल लेना अनिवार्य कर दिया है। मेडिकल कॉलेज से नाक से सेम्पल लेने वाली स्टीक भी मंगवा ली गई है। सभी टीमों सख्त निर्देश दिए है, लेकिन यदि एक सेम्पल लेना पाया जाता है तो इसकी जांच करवाई जाएगी।

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