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कचरा भी कमाई का जरिया:इंदौर ने बनाया देश का पहला जीरो वेस्ट वार्ड, गीले कचरे से घरों में बन रही खाद, ढाई रुपए किलो बेच रहे सूखा कचरा

दीपेश शर्मा। इंदौर2 महीने पहले
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कचरा प्रबंधन का नया मॉडल - Dainik Bhaskar
कचरा प्रबंधन का नया मॉडल
  • इंदौर का एक वार्ड नई मिसाल बनकर उभरा

गंदगी से जूझ रहे शहरों के लिए इंदौर का एक वार्ड नई मिसाल बनकर उभरा है। 4458 घर वाला वार्ड 73 देश का पहला जीरो वेस्ट और जीरो डस्ट वार्ड बन गया है। सैफीनगर, बद्रीबाग, श्यामनगर सहित आसपास के इलाके इस वार्ड में शामिल हैं। यहां के 600 घर ऐसे हैं, जहां गीले कचरे से कम्पोस्ट खाद बन रहा है और सूखा कचरा कमाई का जरिया बन गया है। जल्द ही मुख्यमंत्री इसकी घोषणा करने वाले हैं।

प्रयास : धूप के हिसाब से चुने टेराकोटा व प्लास्टिक बिन

सकीना सलीम ने बताया कि हमने 18 अक्टूबर से घर में ही गीले कचरे की कम्पोस्टिंग शुरू की है। हमने पहले प्लास्टिक का कम्पोस्ट बिन लिया था, लेकिन हमारे यहां धूप पीछे की तरफ नहीं आती इसलिए बाद में टेराकोटा का बिन लिया। महीनेभर में ही खाद बनकर तैयार हो जाती है। इससे कचरे की समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है।

प्रयोग : 45 दिन में बनने वाली खाद अब 10 दिन में बना रहे

सैफीनगर के एडवोकेट कासिम अली बताते हैं, हमने गीले कचरे से खाद बनाने के लिए निगम से चार बिन लिए हैं। खाद बनने में वैसे 45 दिन लगते हैं लेकिन गीले कचरे को बारिक काटकर बिन में डालें तोे 10 दिन में खाद बन जाती है। इतना ध्यान रखना पड़ता है कि बिन से तीन दिन में पानी निकालते रहना होता है, उससे बदबू नहीं आती।

प्रवीण: पांच साल से गीला कचरा घर में ही प्रोसेस कर रहे

दुरैया रुबी बताती हैं कि हमने पांच साल से निगम को गीला कचरा दिया ही नहीं है। हम घर में निकलने वाले गीले कचरे को प्रोसेस कर खाद बनाते हैं और बगीचे में डालते हैं। इसके लिए हमने घर के पीछे ही कंपोस्ट प्लांट बना रखा है। यह बहुत ही अच्छा प्रयोग है। पौधे भी स्वस्थ रहते हैं और सफाई भी बनी रहती है।

प्रभाव: सूखा कचरा तौलकर देते हैं, आखिरी में पैसे मिलेंगे

प्रकाश यादव कहते हैं कि हम तीन महीने से घर में ही फल, सब्जियों आदि के गीले कचरे से खाद बना रहे हैं। सूखे कचरे के लिए निगम ने बोरे दिए हुए हैं। सप्ताह में दो दिन एनजीओ की गाड़ी आती है और तौलकर कचरा लेती है। इसकी इंट्री के लिए एक कार्ड भी दिया है। महीने के आखिरी में ढाई रुपए किलो के हिसाब से पैसे दिए जाएंगे।

मल्टियों में जहां कम्पोस्टिंग संभव नहीं वहां कर रहे स्वाहा

जीरो वेस्ट वार्ड तैयार करने वाले एनजीओ बेसिक्स के श्रीगोपाल जगताप बताते हैं कि क्षेत्र में 141 बिल्डिंग में 2285 परिवार रहते हैं। उनके लिए कंपोस्टिंग संभव नहीं है। इसलिए इंसिनरेटर स्वाहा की टीम बिल्डिंग का कचरा लेकर मौके पर ही प्रोसेस कर देती है।

पहले हर महीने निकलता था पहाड़ भर कचरा

गीला कचरा- 3800 kg

सूखा कचरा- 2800 kg

सेनेटरी वेस्ट- अब सिर्फ यही निकल रहा है (लगभग) 98 kg

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