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इंदौर में बच्चों के हाथ में किताबों की जगह हल:तिल्लौरखुर्द के 53 बच्चों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट; टैटू भी बनाने लगे मासूमों के हाथ

इंदौर3 महीने पहलेलेखक: नीता सिसौदिया
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जीवन का सबसे खूबसूरत और अहम पड़ाव होता है-"बचपन'। ना चिंता, ना फिक्र, अल्हड़पन और सीखने का जुनून। इंदौर जिले के ग्राम तिल्लौरखुर्द में ऐसे 53 बच्चे मिले हैं, जिनके मासूम चेहरे पर गरीबी की नजर लग गई। इनमें से कुछ हाथों से स्कूल की किताबें छूट गईं। इन बच्चों ने स्कूल की जगह खेतों का रुख कर लिया। यह वे बच्चे हैं, जिनके सामने पेट भरने की नई चुनौती खड़ी हो गई है। कुछ के हालात पहले से खराब थे, तो कुछ पर कोविड-19 महामारी से उपजे हालात ने संकट खड़ा कर दिया है।

महिला एवं बाल विकास विभाग, चाइल्ड लाइन और बाल कल्याण समिति ने स्वयंसेवी संस्था के माध्यम से यहां शिविर लगाया है। इन बच्चों के लिए सुविधाएं जुटाना अब विभाग के सामने चुनौती बन गया है। इसके लिए समाजसेवियों से बात की जा रही है। गांव के 53 बच्चों के पास पास शिक्षा तो दूर है, दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो रहा है। 8-10 बच्चे दिव्यांग हैं। कोरोना की दूसरी लहर में माता-पिता का रोजगार छिन गया। जमा-पूंजी इलाज में खर्च हो गई।

बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष पल्लवी पोरवाल बताती हैं, "मुंबई के NGO केटलिस्ट फॉर सोशल एक्शन (सीएसए) ने सर्वे किया है। इसमें तिल्लौरखुर्द में 53 बच्चों की सूची दी है। ये बच्चे मुश्किल परिस्थितियों में जीने को मजबूर हैं। शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार सहित अन्य बाल अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। कुछ बच्चों के माता-पिता नहीं हैं। जिनके हैं, वह बच्चों को यह सब मुहैय्या नहीं करवा पा रहे। बालश्रम के विरोध में जागरूकता अभियान चला रहे हैं। ऐसे बच्चों को ढूंढा जा रहा है, जो तंगहाली के कारण स्कूल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। सिर्फ एक ही गांव में ऐसे 53 बच्चे मिलना चिंता की बात है।

स्कूल बंद है तो मंदिर में जाकर टैटू बना रहे थे बच्चे
एरोड्रम रोड पर बिजासन माता मंदिर क्षेत्र में इन दिनों बड़ी संख्या में बच्चे छोटी-छोटी दुकान लगाकर बैठ रहे हैं। यह टैटू बनाने का काम कर रहे हैं। यह बच्चे कक्षा छठीं, सातवीं और आठवीं के छात्र हैं। मां-बाप काम करने निकल जाते हैं, तो बच्चे टैटू बनाकर पैसा कमाने। चाइल्ड लाइन की टीम जब मौके पर पहुंची, तो बच्चों का जवाब था कि ऑनलाइन क्लास चलती है, इसलिए खाली समय में काम कर रहे हैं। हालांकि अधिकारियों ने उन्हें इस बार समझाइश देकर छोड़ दिया।

कोरोना के इलाज में सबकुछ खर्च हो गया
इसी गांव में घनश्याम भी रहते हैं। जिनकी 5 साल की बेटी और 7 साल का बेटा है। पत्नी की कोरोना संक्रमण के कारण डेथ हो गई। वे खुद भी कई दिनों तक कोविड अस्पताल में भर्ती रहे। अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुके हैं। घर आ गए, लेकिन अब शारीरिक हालत ऐसी नहीं है कि काम कर सके। फीस तक भरने के पैसे नहीं हैं। राशन कहां लाए और बच्चों को कहां से खिलाएंगे। इस साल बच्चों का किसी स्कूल में दाखिला नहीं करवा सके।

पढ़ना चाहती हूं, लेकिन घर में कमाने वाला कोई
गांव की रहने वाली 14 साल की सुनीता अपनी दोनों बहनों के साथ काम करने जाती है। उनकी उम्र भी 15,16 साल है। वह मां भी मजदूरी करती है। चौथी के बाद पढ़ाई छोड़ दी। पिता परिवार को छोड़कर जा चुके हैं, इसलिए मां के साथ उन्हें भी रोज मजदूरी करने के लिए खेतों में जाना पड़ता है। वह स्कूल जाती थी, लेकिन पैसों की कमी के कारण छोड़ दी। कभी किसी दिन सौ रुपए तो कभी तीन सौ रुपए मिल जाते हैं। पढ़ना चाहती है, लेकिन आगे कैसे बढ़े, कुछ पता नहीं है।

इंदौर की स्थिति

बीते 4 सालों में इंदौर जिले में बालश्रम के 236 मामले सामने आए हैं। माना जा रहा था कि कोरोना महामारी के बाद बिगड़े हालत में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ी होगी, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में ऐसे 9 मामले ही दर्ज हुए हँ।

क्या है बालश्रम

  • संविधान के अनुसार 14 साल से कम उम्र के बच्चों से कारखानों, दुकानों, घरों, होटल या खदानों में काम नहीं करवाया जा सकता है। बच्चों का शोषण सिर्फ उनसे काम करवाने तक ही नहीं, बल्कि उनसे ऐसा काम भी नहीं करवाया जा सकता है जिसके लिए वे मानसिक या शारीरिक रूप से तैयार नहीं हो। मूल अधिकारों के अनुच्छेद 24 के तहत बालश्रम प्रतिबंधित है।
  • मप्र बाल आयोग के अध्यक्ष ब्रजेश चौहान कहते है कि हाल ही में झाबुआ, आलीराजपुर, बेतुल और धार जिले में जाना हुआ। वहां कई परिवार रोजगार की तलाश में पलायन कर चुके है। अब चिंता इस बात की है कि उनके साथ उनके बच्चे भी काम पर निकल गए। वे सभी बालश्रम की ओर धकेल दिए जाएंगे। वे कहते है कि प्रदेश में हर साल बमुश्किल तीन-चार मामले सामने आते है जिनमें प्रकरण दर्ज हो पाते हैं।
  • जनगणना 2011 के तहत भारत में बाल मजदूरों की संख्या 1.01 करोड़ है। जिनमें 56 लाख लड़के और 45 लाख लड़कियां है। 2001 की जनगणना में यह संख्या 1 करोड़ 21 लाख थी। आईएलओ की रिपोर्ट इस ओर गंभीर इशारा कर रही है कि कोविड-19 महामारी के कारण 2022 तक करीब 90 लाख बच्चे बाल श्रम की ओर झोंके जा सकते है। बालश्रम को रोके जाने के प्रयास कमजोर हो गए हैं।
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