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जेल विभाग का आदेश बना पुलिस के लिए परेशानी:24 मेडिकल जांच में लग रहे 8 से 9 घंटे, आरोपियों को समय पर जेल नहीं भेज पा रही पुलिस, कोर्ट की अवमानना का खतरा

इंदौरएक महीने पहलेलेखक: सुमित ठक्कर
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मानव अधिकार आयोग ने थानों में आरोपियों के साथ होने वाली प्रताड़ना के लिए यह फार्मेट बनाया है, लेकिन छोटे मामलों में कैदियों के लिए मेडिकल गोपनीयता भंग हो रही है। - Dainik Bhaskar
मानव अधिकार आयोग ने थानों में आरोपियों के साथ होने वाली प्रताड़ना के लिए यह फार्मेट बनाया है, लेकिन छोटे मामलों में कैदियों के लिए मेडिकल गोपनीयता भंग हो रही है।

कोरोना, एसटीडी (सेक्सुअली ट्रांसमीटेड डिसीज) सहित करीब 24 से ज्यादा जांचें कराने के बाद ही आरोपियों को जेल में दाखिल करने का आदेश अब पुलिस के लिए परेशानी का सबब बन गया है। एक आरोपी की जांच में आठ से नौ घंटे लग रहे हैं। एक दिन में इनकी जांच रिपोर्ट भी नहीं आ पाती। इससे समय पर जेल नहीं भेजने पर अधिकारियों को कोर्ट की अवमानना का भी खतरा मंडरा रहा है।

गौरतलब है कि पुलिस अधीक्षकों के नाम जारी आदेश में कहा गया है कि पुलिस अभिरक्षा से न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजने से पहले बंदियों की (कोविड-19) संबंधी टेस्ट कराने के साथ-साथ सात प्रमुख हेड में करीब 24 से ज्यादा जांचें कराना हैं। इनके मेडिकल सर्टिफिकेट जारी होने पर ही जेल में दाखिल करें।

जांचें, जो कराना हैं जरूरी

24 बिंदुओं की जांच में बंदी (आरोपी) की प्रीवियस मेडिकल हिस्ट्री, वर्तमान बीमारी की जानकारी, बीमारी के लिए ली जाने वाली दवाएं, गले में बलगम की शिकायत है तो उसकी जांच, किसी दवा से रिएक्शन है तो उसकी जांच, इसके अलावा बंदी कोई जानकारी दे वह भी। फिजिकल वेरिफिकेशन में - हाइट, वेट, महिला कैदी है तो (मासिक धर्म) की डेट, आंखों में पीलापन का टेस्ट, ग्रंथियों में विस्तारण (लिफ्म नोड), नाखूनों/कुबड़ों में दरार, नीलापन और पीलिया और शरीर पर चोट की जांच।

इसी में पैथोलॉजी जांच, टीबी के लिए एक्स-रे, ब्लड संबंधी सभी तरह की जांच, मुख्य रूप से एचआईवी टेस्ट (यदि बंदी चाहे तो), हेपेटाइटिस के लिए ब्लड टेस्ट व सेक्सुअली ट्रांसमीटेड डिसीज (एसटीडी), इसके अलावा स्नायु तंत्र, हृदय व धमनी तंत्र, श्वसन तंत्र, आंख, कान, नाक और गला, पाचन एवं उदर रोक की जांच, दांत-मसूड़ों की जांचें जरूरी हैं।

अभी विभाग को बजट भी स्वीकृत नहीं- टेस्ट कराने में पुलिस के ही लग रहे तीन से चार हजार रुपए

मुसीबत तब होती है, जब दोपहर में कोर्ट से जेल वारंट के आदेश होते हैं और घंटों मेडिकल के लिए शासकीय अस्पतालों में जांच पूरी नहीं हो पाती या कुछ जांचों की रिपोर्ट नहीं मिलती तो जेल ले जाने पर भी आरोपियों को दाखिल नहीं किया जाता। यही नहीं, पुलिस को टेस्ट पर 3 से 4 हजार रुपए भी खर्च करना पड़ रहे हैं। इसके लिए कोई बजट भी स्वीकृत नहीं है।

24 घंटे के लिए नियुक्त करना होगा विशेषज्ञ

नई व्यवस्था शुरू करने से पहले पुलिस विभाग के लिए न तो कोई बजट तैयार किया गया, ना ही डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे सरकारी अस्पतालों में अमले की व्यवस्था की गई। 24 से ज्यादा टेस्ट की जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग को एक सीएमएचओ या एमडी रैंक का विशेषज्ञ 24 घंटे के लिए नियुक्त करना पड़ेगा, तब भी संभव नहीं की जो जांचें एक दिन में पूरी हो पाएं।

बड़ा सवाल- मेडिकल गोपनीयता भंग होने का अंदेशा

  1. मानव अधिकार आयोग ने थानों में आरोपियों के साथ होने वाली प्रताड़ना के लिए यह फार्मेट बनाया है, लेकिन छोटे मामलों में कैदियों के लिए मेडिकल गोपनीयता भंग हो रही है, क्योंकि संक्रमित रोगों, एचआईवी, मासिक धर्म के टेस्ट भी कराए जा रहे हैं। इनकी एक दिन में या कुछ घंटों में जांच सर्टिफाइड कराना संभव नहीं है।

पहले 20 से 25 मिनट में हो जाती थी जांच

आरोपी को जेल भेजने के लिए सामान्य तौर पर जा पुरानी मेडिकल व्यवस्था थी, वह 20 से 25 मिनट में हो जाती थी। पांच बिंदुओं पर जांच पूरी कर आरोपी को जेल भेज दिया जाता था। इसमें आरोपी के शरीर पर चोट (चौड़ाई, लंबाई व गहराई), किस भाग में चोट लगी, घाव किस तरह के हथियार का है, साधारण है या गंभीर जैसे सामान्य बिंदुओं पर जांच हो जाती थी।

रोज 15 से 20 आरोपी एमवायएच और जिला अस्पताल मेडिकल के लिए भेजे जाते हैं

शहर में 35 थाने हैं। यहां से रोजाना 15 से 20 आरोपी एमवायएच और जिला अस्पताल मेडिकल कराने के लिए भेजे जाते हैं। 24 बिंदुओं पर जांच के लिए एक पुलिसकर्मी को पूरा दिन अस्पताल में गुजारना पड़ रहा है। इससे थाने के दूसरे काम प्रभावित होते हैं। गंभीर मामलों के आरोपियों के लिए चार जवान अस्पताल भेजे जाते हैं। वहीं सामान्य मामलों में दो जवान जाते हैं। यदि किसी थाने में तीन चार मामलों के अपराधी पकड़े गए हों तो आधा स्टाफ थाने से मेडिकल में लग जाता है, जबकि पुरानी व्यवस्था में आधे घंटे में एमवायएच में मेडिकल हो जाता था।

अधिकारी बोले- राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का आदेश है, पालन तो करना ही होगा

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने बंदियों के मानव अधिकार को देखते हुए ये बिंदु तय किए हैं। इन्हें मानना ही होगा। यह व्यवस्था जेल में संभव नहीं है। जांचें किसी भी शहर के जिला या सरकारी अस्पताल में ठीक से हो सकती हैं। जेल में दाखिल के लिए मेरे पास कई शहरों से कुछ समस्याएं आई हैं। उन्हें सुधारा जाएगा। -अरविंद कुमार, एडीजी, जेल विभाग

देशभर में ये फार्मेट लागू हुआ है

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने ये फॉर्मेट देशभर में लागू कराया है। सभी जगह इसे फॉलो किया जा रहा है। इसमें कुछ गंभीर बीमारियों के टेस्ट बंदी की अनुमति लेकर ही कराए जा रहे हैं। टेस्ट न होने की कंडीशन में जेल दाखिल करने की प्रक्रिया नहीं रुक रही है। फिर भी कहीं कोई समस्या है तो स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक कर इस व्यवस्था को और बेहतर बनाएंगे। - राजेश राजौरा, अपर मुख्य सचिव, जेल विभाग