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इंदौर की इम्युनिटी बूस्टर गजक बन गई ग्लोबल ब्रांड:90 साल पहले पहली बार बनी, हैरत से देखते थे लोग; अब इंदौरियों का शौक और परंपरा

इंदौरएक महीने पहले
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आज आपको लिए चलते हैं इंदौर के 90 साल पुराने गजक के ठिये पर। हम बात कर रहे हैं शीतल गजक इंदौर की, जिसके स्वाद के खुद पीएम मोदी भी दीवाने हैं।

करारी मिठाई गजक है ठंड की रानी
जब गन्ने से बने गुड़ को भट्टी पर गर्म कर उसकी चाशनी बनाई जाती है और उसमें सिके हुए तिल को कश्मीर की केसर के साथ ओटाया जाता है। फिर उसे तब तक हाथों और लकड़ी से बने दामुल से कूटा जाता है जब तक कि सुनहरे सिके तिल अपना तेल उसी में छोड़ कर इम्युनिटी बूस्टर न बना दें। इसे बाद उसे ठंडा किया जाता है। इस दौरान मीठी महक पूरे माहौल में घुलती है, उसी का नाम है गजक।

देसी गुड़ की गजक राजस्थान और बुंदेलखंड की देन है। इंदौर, मुरैना और जयपुर में इसके बेहतरीन हब हैं, जो देश में फेमस है। शीतल गजक की बात ही निराली है। इसका कोई तोड़ नहीं, ये है नंबर 1 गजक।

50 से ज्यादा वैराइटी की गजक बनती है शीतल गजक पर
गुड़ की गजक, चुनमुन टिकिया, मेवा मधुर लड्डू, तिल सकरी, तिल पट्टी और आज की पीढ़ी के लिए चॉकलेट गजक / केक, इनकी गजक में एक दाना भी शक्कर नहीं होता है।

इंदौर में सबसे पहले गजक लाने और बनाने का श्रेय इन्हीं को
बात 1931 से शुरू होती है, इनके दादा स्व. श्री सीताराम जी सैनी के ठेले पर कुल्फी बेचने से। वे राजस्थान से 14 वर्ष की उम्र में यहां आए और छावनी में राज टाॅकीज के सामने ठेले पर कुल्फी का व्यवसाय शुरू किया। ठंड में पहले मूंगफली बेचीं और उसके 2 साल बाद से गजक बनाना शुरू कर दिया। गुड़ शक्कर और मावे की गजक की शुरुआत इंदौर में इन्होंने ही की |

पहले लोग इसे बड़ी हैरत से देखते थे, यह मिठाई इंदौर के लिए एकदम नई थी।
शीतल गजक ठंड में इन्दोरियों का शौक और परम्परा दोनों बन गई गई है । 1931 से शुरू हुई इस इन्दोरी ब्रांड जो अब पूरी दुनिया में एक्सपोर्ट हो रहा है कि कहानी आज आपके सामने है।

इंदौर में हाई कोर्ट के सामने, एमजी रोड पर स्थित इस गजक शो रूम पे आकर आप सुध-बुध खो सकते हैं, इनका प्यार और आपको मनुहार से गजक टेस्ट कराना सिर्फ शीतल गजक पर ही संभव है |

नई पीढ़ी
जब दूसरी पीढ़ी आई, श्री पुरुषोत्तम सैनी जी की तो उन्होंने ठेले पर इसे बेचने को मना किया। पिता ने छावनी में “टाटाजी” का ओटला किराए पर लिया, उस पर बैठकर कुल्फी बेचने की शुरुआत हुई। अब तीसरी इस पीढ़ी, जिसमें सनी और रणजीत सैनी हैं, ने छावनी और एमजी रोड (हाईकोर्ट के सामने ) की दुकान ली और ग्राहकों को बैठाकर कुल्फी, गजक, रबड़ी भी पेश कर रहे हैं और इंदौर ने भी उन्हें उतना ही प्यार दिया है।

तीसरी पीढ़ी भी लाती है कश्मीर से असली और शुद्ध केसर
शीतल गजक के संचालक सनी बताते हैं कि दादाजी और पिताजी ने अपने वेंडर्स सिलेक्ट किए थे वो ही तब से आज तक हमें उच्च क्वालिटी का माल सप्लाई कर रहें हैं, हम और वो इसीलिए यह स्वाद बरकरार रख पाए हैं कि कश्मीर से केसर हर वर्ष का कोटा देने वहां के वेंडर आते हैं, अपनी तीसरी पीढ़ी के गजक का गुड़ आता है।

यूपी के गन्ना किसानों की तीसरी पीढ़ी से यही गुड़ इनकी गजक को एक विशेष स्वाद और महक देता है। शीतल कुल्फी का स्टाफ भी बेहद अपने मालिक की तरह विनम्र और मेहनती है।

कड़क नोट और सिक्के भी हैं पहचान
मजेदार वाकिया सनी बताते हैं कि एक बार एक ग्राहक का फोन आया कि “भैया जब मेरे लड़के ने मुझे बाकि बचे पैसे दिए तो नोट और सिक्के देखकर ही मैंने बता दिया कि वह शीतल से गजक नहीं लाया है, क्योंकि नोट और सिक्के नए और कड़क नहीं हैं। जी हां, शीतल कुल्फी की एक और पहचान है, यहां से मिलने वाले कड़क नोट और नए सिक्के ही देते हैं, जो कि बाकी बचे पैसे के रूप में मिलते हैं।

ठाकुर जी प्रभु कृपा ही सफलता का आधार
शीतल कुल्फी परिवार कृष्ण-भक्त हैं और पूरी सफलता का श्रेय भगवान् श्रीकृष्ण ठाकुर जी की कृपा को देते हैं। सांवरिया सेठ के भक्त सनी अपनी दुकान से किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति या गरीब को मिठाई और पैसे दिए बगैर जाने नहीं देते।
तो अब क्यूं ना जाएं कोई शीतल कुल्फी …अब विजयनगर में भी मंगल सिटी मॉल के सामने खुल गया है शीतल कुल्फी

रोजाना एक टन गजक बनाते हैं
वे खुद रोजाना एक टन गजक बनाते हैं जो हाथों-हाथ बिक जाती है। कई ग्राहकों को खाली हाथ भी लौटना पड़ता है। दुबई, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा , ऑस्ट्रेलिया तक जाती है गजक।
शीतल गजक वाले सनी बताते हैं कि इन्दोरी रोजाना 15 से 20 टन गजक खा जाते हैं। इंदौर और अप कंट्री मॉर्केट काफी बड़ा है।
गजक खाओ- सेहत बनाओ।
-समीर शर्मा, (9755012734)