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दिलीप कुमार से जुड़ी इंदौरी यादें...:अभिनेता के बंगले के लिए इंदौर के नूर मोहम्मद ने 3 टन वजनी शाही राजस्थानी गेट बनाया था

इंदौर3 महीने पहले
नयापुरा निवासी फैब्रिकेटर संचालक नूर मोहम्मद खत्री।

अभिनेता दिलीप कुमार की कई यादें इंदौर से भी जुड़ी हैं। इन्हीं में एक है नयापुरा निवासी फैब्रिकेटर संचालक नूर मोहम्मद खत्री उर्फ हाजी साहब। उन्होंने 1994 में दिलीप कुमार के बंगले के लिए इंदौर में तीन टन वजनी गेट बनाया था। सुबह करीब 9 बजे उन्हें दिलीप कुमार के निधन की खबर मिली, तो सुबकने लगे।

बकौल नूर मोहम्मद, उन्हीं के रिश्तेदार टाइल्स व्यवसायी नूर साहब गौरी के दिलीपजी से अच्छे संबंध थे। 1994 में नूर साहब ने दिलीपजी से मेरा जिक्र किया कि वे बंगलों के गेट बहुत अच्छे बनाते हैं तो दिलीप साहब ने मुझे मुंबई बुलाया। मैं नूर साहब के साथ कैटलॉग लेकर उनके बंगले पर गया, तो हैरत में रह गया। इतने बड़े अभिनेता होने के बावजूद उन्होंने मुझे काफी सम्मान दिया। दिलीपजी ने हमारे लिए खुद दो बार चाय बनाई। राजस्थानी पैटर्न का शाही गेट पसंद कर बनाने के लिए भी कहा।

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मैंने अपने सहयोगियों के साथ 20 दिनों में गेट बनाकर दिया, जो चार दरवाजे वाला मुगल कला पर आधारित था। दिलीप साहब को गेट बहुत अच्छा लगा। वे गदगद हो गए। दो दिन में वहां मेरी उनसे 4 बार मुलाकातें हुईं। इंदौर रवाना होने के दौरान वे मुझे और नूर साहब जाने नहीं दे रहे थे। वे उस दौरान अशोक कुमार के किसी प्रोग्राम में जाने वाले थे। कार में बैठ गए थे। फिर कहा, तुम्हारे टिकट करा दिए गए हैं। वे कार में से फिर उतरकर आए। कहा कि खुदा हाफिज…। उनका यह व्यक्तित्व दिल को छू लेने वाला था, यह उनका बड़प्पन था।

सीनियर राइटर व फिल्म समीक्षक ब्रजभूषण चतुर्वेदी।
सीनियर राइटर व फिल्म समीक्षक ब्रजभूषण चतुर्वेदी।

2007 में वो आखिरी समय था, जब उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा

सीनियर राइटर व फिल्म समीक्षक ब्रजभूषण चतुर्वेदी ने बताया कि दिलीप साहब से मेरी 7-8 बार मुलाकात हुई, जिसमें से कई बार शूूटिंग पर हुई। मैं उनका बड़ा फैन रहा हूं। उनका जैसा कलाकार सदियों में एक बार पैदा होता है। उन्हें ट्रैजेडी किंग कहें या कुछ और, वे बॉलीवुड के विश्वविद्यालय थे।

दिलीप साहब सर्वगुण संपन्न थे। अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र व शाहरुख खान तक उनके फैन रहे हैं। उनसे पहली मुलाकात फिल्म ‘आन’ के सेट पर लालबाग इंदौर में हुई थी। नवलखा में अभिनेेत्री नादिरा के साथ उनका एक गाना यहां फिल्माया था, उस दौरान मैं उनके साथ में था। फिर फिल्म दिल दिया दर्द लिया, मुगल-ए-आजम के गाने, क्रांति व सौदागार फिल्म के सेट पर मुलाकात हुई थी। आखिरी बार 2007 में दादा साहब फाल्के अवाॅर्ड समारोह में मुलाकात हुई थी।

उन्होंने मेरी ओर देखा तो मुस्कुराए व सिर पर हाथ रखा। कई दिनों से वे अक्सर बीमार रहने लगे थे। छह महीने पहले मुझे ऐसा लगा कि पता नहीं कब उनकी सांसें रुक जाएं, तो मैंने उन पर एक लेख लिखा जो दो महीने पहले ही प्रकाशित हुआ है। वे एक महान कलाकार थे। ऐसा महान कलाकर न पैदा हुआ है न होगा।

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