यहां बेटे नहीं, बेटियां संभालती हैं मां की विरासत:आठ पीढ़ियों से मां हरसिद्धि की आराधना का अधिकार सिर्फ बेटियों के पास

इंदौर15 दिन पहलेलेखक: गौरव शर्मा
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मां हरसिद्धि बेटियों को सेवा का मौका देती है। ये गर्व की बात है। - नमिता शुक्ला फोटो | ओपी सोनी - Dainik Bhaskar
मां हरसिद्धि बेटियों को सेवा का मौका देती है। ये गर्व की बात है। - नमिता शुक्ला फोटो | ओपी सोनी

मां हरसिद्धि मंदिर की पूजन परंपरा बेटियों के लिए मां के वरदान की तरह है। आमतौर पर विरासत सौंपने की बारी आती है तो ज्यादातर लोग बेटों को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन मां हरसिद्धि की पूजा का अधिकार आठ पीढ़ियों से बेटियों को सौंपा जा रहा है।

होलकर ट्रस्ट द्वारा संचालित इस मंदिर में पूजन की जिम्मेदारी 1766 में वंशानुगत सनद द्वारा पं. जनार्दन भट्‌ट को सौंपी गई थी। उनके बाद बेटे ने यह जिम्मेदारी निभाई, लेकिन तीसरी पीढ़ी से यह विरासत बेटियों को ही सौंपी जा रही है। परिवार की 10 पीढ़ियां मां की सेवा कर चुकी।

ऐसे बनी परंपरा- तीसरी पीढ़ी में हुई बेटी तो उसी को सौंपी जिम्मेदारी, शुरू हुआ सिलसिला

मंदिर की स्थापना 21 मार्च 1766 को हुई थी। प्रथम पुजारी पं. भट्ट की तीसरी पीढ़ी में बेटी होने पर उन्हें उत्तराधिकारी बनाया गया। तब से यह परंपरा चली आ रही है। देवी के शृंगार व मंदिर की व्यवस्थाएं बेटियां व उनके पति संभालते हैं। फिलहाल राजेश्वरी जोशी और पं. राधेश्याम जोशी तथा उनके बेटी-दामाद नमिता व दामाद सुनील शुक्ला ये जिम्मा निभा रहे हैं।

ऐसा है स्वरूप- दाहिनी भुजा में तलवार और बायीं में है महिषासुर का मुंड

पं. राधेश्याम जोशी व पं. सुनील शुक्ला बताते हैं कि मंदिर के सामने दीपस्तंभ के नीचे बावड़ी थी। उसी में से मां का विग्रह निकला था। मूर्ति चतुर्भुज स्वरूप, महिषासुर मर्दिनी है। दाहिनी भुजा में तलवार, त्रिशूल, बायीं भुजा में महिषासुर का मुंड है। वे सिंह पर सवार हैं।

मंदिर में अष्टभैरव, महालक्ष्मी-सिद्धिदात्री भी

  • मंदिर की स्थापना होलकर राजवंश ने की थी। मंदिर देवी अहिल्याबाई होलकर ट्रस्ट द्वारा संचालित है।
  • मंदिर के गर्भगृह में देवी के एक ओर सिद्धिदात्री मां है, वहीं दूसरी और महालक्ष्मी। महालक्ष्मी अमृतकलश लिए हुए हैं।
  • मंदिर में अष्ट भैरव भी विराजमान हैं। तीन-तीन गर्भगृह के सामने और दो आगे की ओर स्थापित हैं।
  • इनके साथ ही विनायक और हनुमानजी का मंदिर भी स्थापित हैं।

(जानकारी मंदिर के पुजारियों के अनुसार)

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