पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

लंदन में डिप्टी मेयर बने इंदौर के राजेश की कहानी:बाइक बेचकर विदेश जाने के लिए खरीदा था प्लेन का टिकट, बिजनेस करने के लिए बैंक ने लोन भी नहीं दिया था

इंदौर4 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
अग्रवाल ने इंदौर के सेंटपॉल स्कूल से पढ़ाई की है। - Dainik Bhaskar
अग्रवाल ने इंदौर के सेंटपॉल स्कूल से पढ़ाई की है।

इंदौर के राजेश अग्रवाल को लंदन के नवनिर्वाचित मेयर सादिक खान ने लगातार दूसरी बार डिप्टी मेयर (बिजनेस) नियुक्त किया है। अग्रवाल का कार्यकाल 2024 तक रहेगा। इससे पहले वे जुलाई 2016 में डिप्टी मेयर बने थे। इंदौर के सेंट पॉल स्कूल से शिक्षा हासिल करने वाले अग्रवाल वहां दो कंपनियां संचालित करते हैं। उनका पांच साल का कार्यकाल ब्रेक्जिट और कोविड जैसी चुनौतियों के बीच भी उपलब्धियों से भरा रहा।

इस नियुक्ति पर अग्रवाल ने दैनिक भास्कर से कहा- दूसरी बार ये अवसर मिलना बड़ी बात है। लंदन ने मुझे बहुत कुछ दिया है। मैं इस कार्यकाल में भी अपनी 100 फीसदी क्षमता से लंदन के लोगों के लिए काम करूंगा। गौरतलब है, दो दिन पहले ही मेयर का चुनाव जीते सादिक खान ने अगले तीन साल के लिए नौकरी को प्राथमिकता बनाया है। पहली बार मेयर रहते अग्रवाल इंदौर आए थे। उस समय उन्होंने कई बातें शेयर की थीं।

राजेश अग्रवाल रोजमर्रा की जिंदगी में आसपास घटती छोटी-बड़ी घटनाओं से बड़े सबक सीखने वाले शख्स हैं। उन्होंने बताया था कि जुगाड़, जल्द पहचान बढ़ाना और इंदौर से मिली मिलनसारिता ने उन्हें इस पद तक पहुंचने में मदद की।

राजेश अग्रवाल ने एक घटना बताते हुए कहा था कि लंदन में एक बार एक स्वीपर को मैंने देखा। सड़क पर वो जहां-जहां सफाई करता, लोग वहां कचरा कर देते। मुस्कराते हुए वह फिर सफाई करता। लोग फिर वहीं कचरा करते। यह क्रम चलता रहा। मैंने उससे पूछा कि तुम्हें गुस्सा नहीं आता लोगों पर? उसने कहा यह मेरा काम है। मुझे इसे करने में खुशी मिलती है। मैं सड़क हमेशा साफ देखना चाहता हूं। लोग क्या कर रहे हैं, इसके बजाय मेरे लिए यह मायने रखता है कि मैं क्या कर रहा हूं। मुझे यहां से जीवन का बड़ा सबक मिला। काम कोई भी हो, उसे इस तरह करो कि उस काम के लिए लोग आपको याद करें।

बाइक बेचकर प्लेन का टिकट खरीदा
इंदौर के मनीष बाग कॉलोनी में रहने वाले अग्रवाल ने बताया, वे सेंटपॉल स्कूल में पढ़े। मां स्कूल टीचर और पिता सरकारी नौकरी में थे। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन पिता ने सिद्धांतों को महत्व देना सिखाया। किसी तरह बीबीए और एमबीए किया। यह बात है 1999 की। मैंने इंदौर छोड़ा। मुझे वेब डिजाइनिंग में सेल्स के काम के दौरान छह माह मुंबई, छह माह लंदन जाने का मौका मिला। कंपनी ने कहा- टिकट करा लो, रीइम्बर्समेंट देंगे। मेरे पास पैसे नहीं थे। मैंने बाइक बेची। 30 सितंबर 2001 को पहली बार प्लेन में बैठा।

विकीपीडिया से मिली भरोसा करने की सीख
मेरे दोस्त विकीपीडिया के फाउंडर जिमी वेल्स से मैंने पूछा कि ऐसा कंटेंट क्यों रख रहे हो, जिसे कोई भी एडिट कर सके। जिमी ने कहा- ट्रस्ट करना ज़रूरी है। दूसरों से हम यही अपेक्षा करते हैं, लेकिन अपने कलीग्स और लोगों पर यकीन नहीं करते।

समाज के लिए कुछ करना चैरिटी नहीं, जिम्मेदारी है
दौलत आती है, तो लाइफस्टाइल के साथ आपके प्रति लोगों का रवैया बदल जाता है। मेरे साथ यही हुआ, तो मैंने चैरिटी शुरू की। संपन्न लोगों को इसके लिए कन्विंस किया। सोसायटी के लिए कुछ करना चैरिटी नहीं, जिम्मेदारी है। पॉलिटिक्स में मैं चैरिटी से जुड़कर ही आया। बड़े पैमाने पर कुछ करने के लिए पॉलिटिक्स में उतरना ही होगा।

ऐसा वातावरण चाहिए हमें जहां फेल्योर का भी सम्मान करें
मैं बिज़नेस करने के लिए बैंक के पास लोन लेने गया। 10 हजार पाउंड का। नहीं मिला। दो दिन बाद इसी बैंक में मैंने कार के लिए लोन मांगा। मिल गया। मैंने सीखा कि हालात हमें नहीं हराते, हम खुद ही, खुद की हार घोषित करते हैं। सिलिकॉन वैली इसीलिए सक्सेसफुल है, क्योंकि वहां फेल्योर्स का भी सम्मान किया गया। हमें ऐसा ही कल्चर तैयार करना है, जहां लोग फेल्योर को एप्रीशिएट करें।