एजुकेशन एक्पर्ट्स सीरीज:कल्पवृक्ष एकेडमी के डायरेक्टर बोले- कोचिंग के बाद बचे टाइम का उपयोग सही कर लिया तो सब आसान हो जाएगा

इंदौर2 महीने पहले

कोरोना के बाद ऑफलाइन क्लासेस लगना शुरू हो गई है और काम्पिटेटिव एग्जाम की तैयारी भी हो रही है। इसके अच्छे परिणाम भी आगे देखने को मिलेंगे, क्योंकि ऑफलाइन क्लासेस में छात्रों पर पूरा ध्यान शिक्षक देते हैं। समय-समय पर शिक्षक छात्रों को मोटिवेड भी करते हैं ताकि उनका उत्साह बना रहता है और वे अच्छे से पढ़ाई में फोकस कर पाते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स के लिए दैनिक भास्कर ने स्पेशल सीरीज शुरू की है। इससे न सिर्फ पढ़ाई की राह आसान होगी बल्कि उनके अनुभव, एग्जाम ट्रेंड्स और तकीरों का भी नॉलेज मिलेगा।
कल्पवृक्ष के डायरेक्टर विजित जैन (इंदौर) बता रहे है कि सफलता के लिए सेल्फ डिसिप्लीन और इंटरनेट का सही यूज से ही सफलता की राह आसान कर सकता है।

Q. कॉम्पिटिशन एग्जाम में सफल होने का मूल मंत्र क्या है?
A. पुराने वक्त या हो या अभी का वक्त हो आज भी जो राज है वह है डिसिप्लीन। जब कोई छात्र प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है तो वह 2-4 महीने काफी मोटिवेटेड होकर पढ़ाई करता है। फिर धीरे-धीरे उसका मोटिवेशन कम हो जाता है। लेकिन हम प्रतियोगी परीक्षा की बात करें, खास कर आईआईटी की तैयारी की बात करें या मेडिकल के लिए एनईईटी परीक्षा की बात करें तो 11वीं और 12वीं पूरे दो साल इसकी तैयारी होती है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है छात्र डिसिप्लिन रहे। एक फिक्स शेड्यूल के मुताबिक समय का सही उपयोग करें। आज इंटरनेट का युग है, जिसके फायदे भी है, कि छात्र को कुछ समझ नहीं आया तो वह इंटरनेट पर देखकर समझ सकता है। लेकिन देखने में आया है कि 11वीं और 12वीं के छात्र (टीनेजर) वे इंटरनेट का यूज कम मिस-यूज ज्यादा करता है। मगर जिन बच्चों ने इंटरनेट का मिस-यूज कम यूज ज्यादा किया है। स्वाभाविक है कि उन बच्चों का परिणाम काफी अच्छा आया है। मगर कोविड काल में इंटरनेट का मिस-यूज होने से जेईई का एनईईटी का रिजल्ट देखे तो नेगेटिव इंपैक्ट इसका पड़ा है।

Q. कोविड के पहले की परीक्षाओं और मौजूदा दौर में क्या-क्या बदल गया?
A. कोविड के पहले अब में काफी बदलाव आए है। पहले छात्रों का फिक्स शेड्यूल रहता था कि उसे कोचिंग जाना है। कोचिंग में जो 7 घंटे की क्लास लग रही है उसमें तो उसे पढ़ाई करना ही है। मगर ऑनलाइन स्टडी में छात्र घर पर बैठकर पढ़ाई करता है। घर पर बैठकर पढ़ने में जो 11वीं-12वीं का छात्र होता है वह इतना फोकस होकर पढ़ नहीं पाया। अगर कोचिंग के इस बैच को देखे तो, जिन्होंने हालही में आईआईटी क्लीयर की है उनकी अगर बात करें और तीन साल पहले आईआईटी क्लीयर करने वाले छात्रों की बात करें तो विषय की जो डेप्थ आज से तीन-चार पहले के बच्चों में हुआ करती थी वह डेप्थ अब नहीं पाई गई है। जब शिक्षक सामने नहीं होता है तो छात्र उतनी मेहनत नहीं कर पाता है। क्लास में बच्चों को पढ़ाने के साथ ही मोटिवेट भी किया जाता है। शिक्षक के सामने होने पर छात्र क्लास में फोकस कर पाता है।

Q. चयनित होने वाले विद्यार्थियों का कोई ट्रेंड है। गांव के है या शहर के। इंग्लिश मीडियम के है या हिंदी के भी?
A. पहले ऐसा जरुर रहा था कि इंदौर शहर के या शहरी जगह के बच्चे आईआईटी और एनईईटी की परीक्षा में। मगर बीते 5 से 7 साल में डिस्ट्रिक्ट और तहसील क्षेत्र के बच्चे भी काफी बच्चे आईआईटी में जाना शुरू हो गए है। इसका मुख्य कारण है अवेयरनेस आई है। कई माध्यम से बच्चों में अवेयरनेस आ चुकी है। आज बच्चे को यह पता है कि उसे इंजीनियरिंग में या मेडिकल फील्ड में जाना है तो 11वीं से ही इसकी पढ़ाई शुरू करना है। आज से 10 साल पहले की बात करें तो जो कस्बे के बच्चे होते थे वह 11वीं 12वीं तो करता था फिर वह ड्राप लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता था। मगर आज का छात्र 11वीं से ही जागरुक हो चुका है। हालांकि इंग्लिश मीडियम होने का फायदा जरुर छात्रों को मिलता है।

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