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इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल:लेखन, जीवन, समाज, स्त्री, अभिनय, कहानी और कविता पर बात हुई

इंदौरएक महीने पहले
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दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर नवनीत गुर्जर, लिट फेस्ट के मुख्य आयोजक प्रवीण शर्मा और लेखक विजय मनोहर तिवारी। - Dainik Bhaskar
दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर नवनीत गुर्जर, लिट फेस्ट के मुख्य आयोजक प्रवीण शर्मा और लेखक विजय मनोहर तिवारी।
  • एक सत्र दैनिक भास्कर के संस्थापक रमेशजी की जीवनयात्रा पर भी

इंदौर लिट फेस्ट के पहले दिन पीयूष मिश्रा, स्टोरीटेलर निलेश मिसरा, उदय माहुरकर, कालबेलिया नृत्यांगना गुलाबो सपेरा से चर्चा की गई। इन हस्तियों की कला यात्रा कैसी रही, क्या चुनौतियां आईं। कैसे उन्होंने अपनी कल्पनाओं को आकार दिया, इन सब पर बात हुई। सुननेवाले साथ लाए कुछ हिदायतें, कुछ ख्वाब, उन्हें पूरा करने का हौसला और क्षितिज तक पहुंचने की लगन।

बॉलीवुड में प्रतिभा से ज्यादा हेयरस्टाइल की कद्र
‘ये पल गंवाना ना, ये हल ही तेरा है’ विषय पर अनुपम खेर श्रोताओं से वर्चुअली मिले। उन्होंने कहा - एनएसडी से प्रशिक्षण लेने के बाद मैं मुंबई चला आया। मैं इस यात्रा की शुरुआत कुछ अलग चाहता था, इसलिए सारांश फिल्म की और 29 की उम्र में 65 साल के बूढ़े का किरदार निभाया। बॉलीवुड में प्रतिभा से ज्यादा क़द्र हेयरस्टाइल की है। मैंने काेराेना काल में किताब लिखी। इसमें मेरे अनुभव हैं। कोरोना ने हमें समझाया कि हमने अपने स्वार्थ में प्रकृति को भुला दिया है और प्रकृति ने हथौड़ा चलाकर सबको एक स्तर पर ला दिया।’
बचपन पर बोले - मेरे बचपन का नाम बिट्‌टू है। बिट्टू को मैंने अपने भीतर जिंदा रखा है। बिट्‌टू ही मेरे पैर ज़मीन पर रखता है। हालांकि एक राहत है कि आज केे बच्चे ईमानदार हैं। उनमें नाटकीयता कम है।

एक्टिंग पागलपन के सिवाय कुछ भी नहीं
अ भिनेता-गीतकार पीयूष मिश्रा ने अभिनय का ककहरा और प्रक्रिया पर कहा कि मुंबई जाए बिना मुंबई को समझा नहीं जा सकता। यहां लोग बरसों से मेहनत कर रहे हैं, किस्मत आजमा रहे हैं। मैं खुशकिस्मत हूं कि दिल्ली में 40 साल नाटक करने के बाद मुंबई गया और मुझे जल्दी कामयाबी मिल गई। अभिनय पागलपन के सिवाय कुछ नहीं। यह गीता का निष्काम कर्म है। बिना किसी अपेक्षा के कर्म करना ही अभिनय है। कोरोना काल में मैंने आत्महत्या करने की सोची पर अपने दोस्तों से फोन पर बात कर यह विचार छोड़ दिया। आप जब ऐसी निराशा में हों तो अपने किसी मित्र-परिचित को फोन कर सब उगल दो। इससे आपकी ज़िंदगी बच जाएगी। उन्होंने ‘इक बगल में चांद होगा’ और हुस्ना रचना सुनाई।

जो लोग चीज़ें खुद बनाते हैं, उनमें रिस्क लेने की क्षमता ज्यादा होती है, रमेशजी ऐसे ही थे
‘रमेशजी किसी मैनेजमेंट स्कूल में नहीं पढ़े, लेकिन उन्होंने काम ऐसे किए जो अच्छे प्रबंधन की मिसाल बने। उनकी जीवटता, कुछ करने का जोखिम उठाने की उनकी क्षमता एक मिसाल बनी और वे यह इसलिए कर पाए क्योंकि जब कोई चीज़ आप खुद बनाते हैं तो आपको डर नहीं लगता। उन्हें खुद पर भरोसा था कि वे यह सब फिर से बना लेंगे। इंदौर के बाद जयपुर में दैनिक भास्कर की शुरुआत करने के लिए उन्होंने सारी पूंजी लगा दी। सबने कहा यह बहुत बड़ा रिस्क है। रमेश जी बोले कि ‘मैं एक कमरे केे मकान में दोबारा जाने के लिए तैयार हूं, इसलिए यह जोखिम ले सकता हूं… ऐसे थे रमेश जी।’

दैनिक भास्कर के संस्थापक स्व. रमेश अग्रवाल पर पर हुए सत्र ‘भास्कर के भगीरथ’ में उनके सुपुत्र और भास्कर समूह के डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल व नेशनल एडिटर नवनीत गुर्जर ने उनके व्यक्तित्व पर बात की। गिरीश अग्रवाल बोले - स्टारबक्स के हर मैनेजर को महीने में 10 दिन आउटलेट्स में कॉफी सर्व करना होती है। ताकि वो कस्टमर से सीधे जुड़ सकें। जान सकें कि वह कब झुंझलाता है, क्या चाहता है। रमेश जी इसी तरह काम करते थे। ज़मीन से जुड़कर। इसमें शर्म नहीं आना चाहिए।

कई लोग इसमें झिझकते हैं पर आप अपने ग्राहक से ही नहीं जुड़ेंगे तो ग्राउंड कनेक्ट कैसे कर पाएंगे। रमेशजी निर्भीक थे। राजनीतिक दबावों का असर अखबार पर कभी नहीं होने दिया। संपादकीय को पूरी स्वतंत्रता दी और यही वजह है कि दैनिक भास्कर ने पाठकों का विश्वास जीता। ऐसा नहीं है कि नुकसान नहीं उठाए, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

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