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सुनवाई में त्रुटी:एसडीएम के फरमान से 3 बच्चों के पिता व नाना बन चुके 46 वर्षीय पूर्व फौजी दोबारा नाबालिग घोषित

इंदौर2 महीने पहलेलेखक: देव कुंडल
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रिटायरमेंट के 8 साल बाद तहसीलदार ने घोषित किया था बालिग। - Dainik Bhaskar
रिटायरमेंट के 8 साल बाद तहसीलदार ने घोषित किया था बालिग।

कानून की देवी की आंखों पर पट्‌टी इसलिए बांधी गई है, ताकि वे किसी तरह का भेद न करें, लेकिन अक्सर ऐसे किस्से आते हैं जो इसका उल्टा ही मतलब निकालते हैं। ताजा मामला इंदौर से लगे ग्राम काकूखेड़ी (खुड़ैल)के रिटायर्ड फौजी 46 वर्षीय मांगीलाल मंडलोई का है, जो तीन बच्चों के पिता हैं और नाना भी बन चुके हैं।

सेना में 17 साल नौकरी के बाद सेना से वीआरएस लेकर वे खेती करते हैं। बावजूद इतने सालों तक वे पटवारी के कागजात में नाबालिग ही चल रहे थे। आठ वर्ष पहले 8 माह सुनवाई के बाद तहसीलदार ने उन्हें आठ साल पहले बालिग घोषित किया था, लेकिन अभी एसडीएम कोर्ट के एक आदेश से उन्हें फिर कागजों में नाबालिग करार दे दिया गया है।

ऐसा क्यों किया गया, इसका जवाब किसी के पास नहीं है, लेकिन इस आदेश का खामियाजा मंडलोई को पूरा उठाना पड़ेगा। न वे कोई लोन ले पाएंगे और न ही जमीन का नामांतरण करा सकेंगे।

लोन लेने गए तो पता चला कि कागज में नाबालिग हैं
पूर्व फौजी मंडलोई को पटवारी कागजात में नाबालिग होने का पता तब चला जब उन्होंने बैंक से लोन लेना चाहा। बैंक अधिकारियों की सलाह पर उन्होंने पटवारी रिकॉर्ड में बालिग होने के लिए तहसील कार्यालय इंदौर में मप्र भू राजस्व संहिता की धारा 109, 110 में आवेदन किया।

मई 2019 में किए आवेदन पर तहसीलदार पल्लवी पुराणिक ने 17 मार्च 2020 को उन्हें बालिग घोषित कर दिया। इस आधार पर बैंक से उनका क्रेडिट कार्ड बन गया और लोन भी मिल गया। लेकिन अब एसडीएम ने दोबारा नाबालिग बता दिया है।

सुनवाई में त्रुटी, पलटा आदेश
मंडलोई के बालिग होने पर बावल्या खुर्द निवासी रिश्तेदार श्याम लाल और मनोज ने एसडीएम कोर्ट में आपत्ति लगाई थी। एसडीएम रवीश कुमार श्रीवास्तव ने आदेश में लिख कि राजस्व संहिता की धारा 115 में सुनवाई कर बालिग घोषित किया जाना चाहिए था। तहसीलदार ने प्रक्रियात्मक त्रुटि की है इसलिए आदेश निरस्त कर पूर्व स्थिति कायम की जाती है।

अपील कर सकते हैं
इस बारे में एसडीएम रवीश कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि कोर्ट में तथ्य व नियम के आधार पर निर्णय लिया है। वे चाहें तो आगे अपील कर सकते हैं।

नियम के मायने ये तो नहीं
अभिभाषक विक्रांत होलकर कहते हैं कि कोई अधेड़ व्यक्ति खड़ा हो तो उसे नाबालिग की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता, भले ही फैसला नियम अनुसार न हो।