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ब्लैक फंगस के मरीजों के लिए राहत की खबर:जिस दवा के लिए धरना दिया, गोली खाने को तैयार हुए, वे एम्फोटेरिसिन इंजेक्शन अब इंदौर में ही बनेंगे

इंदौर19 दिन पहलेलेखक: नीता सिसौदिया
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15 जून से ही उत्पादन शुरू करने की तैयारी, रोज 10 हजार डोज बनेंगे। - Dainik Bhaskar
15 जून से ही उत्पादन शुरू करने की तैयारी, रोज 10 हजार डोज बनेंगे।

ब्लैक फंगस से बचाव में उपयोगी एम्फोटेरिसिन बी इंजेक्शन अब इंदौर में ही बनेगा। ड्रग कंट्रोलर मप्र ने सांवेर रोड औद्योगिक क्षेत्र स्थित मॉडर्न लैब को यह इंजेक्शन बनाने की मंजूरी दे दी है। एक सप्ताह में कच्चा माल आते ही उत्पादन भी शुरू हो जाएगा। 15 से 20 जून के बीच इंजेक्शन बाजार में उपलब्ध होने की उम्मीद है।

हर दिन 10 हजार इंजेक्शन बनाए जा सकेंगे। कंपनी चेयरमैन डॉ. अनिल खरया ने बताया कि अनुमानित तौर पर इंजेक्शन करीब तीन हजार रुपए का होगा। ग्रुप प्रेसिडेंट अरुण खरया ने बताया कि इंजेक्शन ब्लैक के साथ व्हाइट और यलो फंगस के उपचार में भी प्रभावी है। इलाज में कारगर पोसाकोनाजाल भी यहां बन रही है। इससे पहले इंदौर की दवा कंपनी को फैबीफ्लू का लाइसेंस मिला था, उसका भी उत्पादन शुरू हो चुका है।

ब्लैक फंगस की पहली तस्वीर: टिशू व बोन को खाने से हो जाती है काली

एमजीएम मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी व माइक्रोबायोलॉजी विभाग ने पहली बार माइक्रोस्कोप से ब्लैक फंगस की जालीनुमा तस्वीर ली है। इससे पता चला है कि जब फंगस शरीर के टिशू को गलाने लगती है तो उस मृत टिशू को काला कर देती है, इसे ही ब्लैक फंगस का नाम दिया गया है।

एमजीएम डीन डॉ. संजय दीक्षित बताते हैं कि डॉक्टर्स सर्जरी के जरिये इसे अलग करते हैं, ताकि आगे ना बढ़ पाए। यह फफूंद टिशु और बोन को गला देती है। डॉ. अशोक यादव कहते हैं कि फंगस की सफाई कर डॉक्टर्स इसी मृत टिशू को निकाल देते हैं। फंगस का खुद का रंग ब्लैक नहीं होता, यह हमारे टिशू व साइनस की बोन को खा लेती है, जिससे इसका रंग काला हो जाता है

खून का प्रवाह बंद कर देती है
ईएनटी स्पेशलिस्ट डाॅ. संजय अग्रवाल कहते हैं कि फंगस नाक व साइनस में ब्लड सप्लाय खत्म कर उस हिस्से को डेड कर देती है। खून की नलियों का रास्ता बंद कर देती है। इसे न हटाएं तो इंजेक्शन काम नहीं करता। पहली स्टेज पर रोक लें तो आंखों तक नहीं जाएगी।

भास्कर एक्सपर्ट

डॉ. वीपी पांडे, प्रोफेसर एमजीएम मेडिकल कॉलेज
ब्लैक फंगस म्युकर फंगस से होती है। यह ब्लड क्लॉट बना देती है। टिशू नष्ट करती है। खून का रंग काला दिखता है। व्हाइट फंगस केंडिडा फंगस से होती है। यह कॉमन समस्या है। इलाज सामान्य एंटीबायोटिक से हो जाता है। यलो फंगस एस्पलजिलेस फंगस से होती है। मरीज को दस्त व पेटदर्द हो सकता है। इलाज भी सामान्य एंटी फंगल दवाइयों से हो जाता है।

अब भोपाल से सीधे अस्पतालों को मिलेंगे इंजेक्शन, इंदौर को पहली बार मिले 1676

इधर, ब्लैक फंगस के इंजेक्शन की कमी को दूर करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने नई आवंटन नीति बनाई है। अब भोपाल से सभी सरकारी व निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के आधार पर इंजेक्शन दिए जा रहे हैं। इंजेक्शन आंवटन में संभागायुक्त व मेडिकल कॉलेज डीन की भूमिका खत्म कर दी गई है।

नई नीति के तहत रविवार को इंदौर के निजी अस्पतालों में भर्ती 227 मरीजों के लिए 602 और एमवाय में भर्ती मरीजों के लिए 1074 यानी कुल 1676 इंजेक्शन मिले। स्वास्थ्य सचिव आकाश त्रिपाठी ने नई नीति को लेकर संभागायुक्त और कलेक्टर को इस संबंध में मॉनिटरिंग के लिए कहा है।

त्रिपाठी का कहना है कि इंजेक्शन आवंटन की पारदर्शी व्यवस्था बनाई है। हर दिन भर्ती मरीजों की सूची विभाग को मिलेगी और उपलब्ध इंजेक्शन के आधार पर सरकारी और निजी अस्पतालों को यह इंजेक्शन दिए जाएंगे।

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