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4 भिखारियों की देखभाल के लिए 8 कर्मचारी:खाली पड़ा है इंदौर में भिक्षुक केंद्र, बुजुर्गों को शिप्रा फेंकने की बजाय यहां आसरा दे सकते थे

इंदौर3 महीने पहले
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भिक्षुक केंद्र - Dainik Bhaskar
भिक्षुक केंद्र

स्वच्छता और सुंदरता के नाम पर बुजुर्गों को इंदौर शहर से बाहर फेंकने के मामले ने सभी को शर्मसार कर दिया। इसके बाद भी नगर निगम के जिम्मेदार सवालों के घेरे में हैं। निगम अधिकारी गलती मानने को तैयार नहीं हैं। निगम के कुछ जिम्मेदारों ने बचने के लिए यह भी कहा कि जिन्हें शहर से बाहर ले जाया जा रहा था, वह सभी भिखारी थे। अगर ऐसा है तो इंदौर के परदेशीपुरा में भिक्षुक केंद्र भी है, इन्हें वहां क्यों नहीं रखा गया। दैनिक भास्कर ने इस भिक्षुक केंद्र को ढूंढा तो देखा कि यहां वर्तमान में चार भिखारी रह रहे हैं, जिनकी देखभाल के लिए 8 कर्मचारियों का स्टाफ है।

इंदौर के परदेशीपुरा में सामाजिक न्याय विभाग का भिक्षुक केंद्र है। यह इसलिए बनाया गया था कि सड़क पर भीख मांगने वालों को वहां रखा जा सके। भिक्षुक केंद्र में इलाज के लिए मेडिकल सुविधाएं भी हैं। भिक्षुकों स्वावलंबी बनाने के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है, ताकि वे दोबारा भीख न मांगें। यहां लाए गए भिखारियों से गार्डनिंग कराई जाती है। प्रिटिंग प्रेस भी है, जिसमें उन्हें प्रशिक्षण देकर पैसा दिया जाता था। कुटीर उद्योग का प्रशिक्षण दिया जाता है। संचालनालय सामाजिक न्याय विभाग से भारी-भरकम बजट मिलता है। नगर निगम के अधिकारियों ने तर्क दिया कि जिन्हें शिप्रा ले जाया जा रहा था, वो भिखारी थे, तो अब बड़ा सवाल यही है कि उन्हें भिक्षुक केंद्र में क्यों नहीं रखा गया।

भिक्षुक केंद्र के प्रभारी सहायक संचालक बी.सी. जैन हैं। एक नर्स, एक मेट्रेंस, एक क्लर्क, चार हेल्पर, एक चपरासी सहित लगभग आठ लोगों का स्टाफ है। भिक्षुक केंद्र परिसर में पर्याप्त जगह है। लगभग आठ कर्मचारियों के स्टाफ पर फिलहाल सिर्फ चार भिक्षुक मिले। सरकार हर भिक्षुक के लिए एक हजार रुपए महीना आवंटित करती है। खाने-पीने के लिए अलग से बजट आता है, पिछले वर्ष कुल 17 भिक्षुक इस केंद्र में लाए गए थे अब मात्र चार ही हैं।

न्यायालय की अनुमति लेना जरूरी

सहायक संचालक बी.सी.जैन का कहना है कि जब भी त्योहारों का समय आता है, तब हमारी टीम शहर में जाकर इन भिक्षुकों का रेस्क्यू करती है, लेकिन इस केंद्र में केवल पुरुषों को ही रखा जाता है। बच्चों और महिलाओं को यहां रखने की अनुमति नहीं है। बच्चों और महिलाओं को रखने का क्षेत्राधिकार महिला एवं बाल विकास के अंतर्गत आता है। यदि भिक्षुको में कोई 18 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को रेस्क्यू किया जाता है तो उसे न्यायालय के समक्ष पेश करके केंद्र में रखने की अनुमति लेना होती है।

दो दिन पूर्व इंदौर में भिक्षुकों को शिप्रा छोड़ने की घटना पर जब जैन से बात की गई तो उनका कहना था कि मानवीय आधार पर नगर निगम उन्हें यहां पर छोड़ सकती थी। कई बार रेस्क्यू में लाए हुए कई लोग कुछ दिनों के लिए हम इस केंद्र में रखते हैं। नगर निगम के पास कई रेन बसेरे तो हैं भिक्षुकों वहां पर भी छोड़ा जा सकता था, लेकिन यह घटना क्यों हुई इस बारे में मैं कुछ नहीं कह पाऊंगा।

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